पिछले सप्ताह राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक निर्णय सुनाया, जिसका मैं तहेदिल से स्वागत करती हूं। एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास में टिके रहने का कोई अधिकार नहीं है और न ही उनके नौकर-चाकर और अन्य घरेलू सुविधाओं पर जनता के पैसे खर्चे जाएंगे। याचिका उस राजस्थान वेतन संशोधन अधिनियम के खिलाफ दायर की गई थी, जिसे वहां की विधानसभा ने 2017 में पारित किया था और जिसमें पूर्व मुख्यमंत्रियों को उनके जीवन काल तक न सिर्फ सरकारी आवास देने का प्रावधान था, बल्कि सरकारी गाड़ी, फोन और नौकर-चाकर रखने की भी अनुमति दी गई थी। न्यायाधीशों ने इसे रद्द करते कहा कि यह प्रावधान एक सामंती वर्ग की नींव रखता है, जो लोकतंत्र के आधार के विपरीत है।
मुझे यह निर्णय सुनकर वैसी ही खुशी हुई, जैसी खुशी इलाहाबाद उच्च न्यायालय से ऐसा ही फैसला सुनने के बाद हुई थी। तब मायावती और अखिलेश को अपने आलीशान सरकारी आवास खाली करने पड़े थे। दोनों के पास निजी घर हैं, लेकिन जनता के पैसों से ऐश करने की आदत पड़ जाए, तो वह जीवन भर रहती है। लखनऊ, पटना, भोपाल, जयपुर जैसी राजधानियों में ऐसे रिहायशी इलाके दिखते हैं, जो बाकी शहर से साफ, सुंदर और आलीशान हैं। यहां वे लोग रहते हैं, जो अपने आपको जनता का सेवक कहते नहीं थकते। मजे की बात यह है कि ये उन लोगों के वारिस हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के समय सामंतशाही के विरोध में अपनी आवाज उठाई थी। लेकिन जब उनकी बारी आई, तो वे राजा-महाराजाओं से भी अधिक सामंतशाही मिजाज के निकले।
याद रहे कि दिल्ली में जनता के तथाकथित सेवक उस लुटियंस जोन में रहते हैं, जहां देश के बड़े धनवान रहते हैं। वहां आम नागरिकों की क्षमता ‘दो गज ज़मीन’ खरीदने की भी नहीं है, क्योंकि वहां एक एकड़ की ही कीमत 150 करोड़ रुपये से ऊपर है। मुझे बहुत उम्मीद थी कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद इस गलत परंपरा को पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा। अन्य लोकतांत्रिक देशों में यह परंपरा नहीं है। अमेरिका में सिर्फ राष्ट्रपति को सरकारी आवास मिलता है और इंग्लैंड में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को। वहां सांसद उन लोगों के बीच में रहते हैं, जिन्होंने उनको अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद में भेजा है।
ऐसा हम भी कर सकते हैं और शुरुआत दिल्ली से होनी चाहिए। पहले भी मैंने यह सुझाव दिया था कि सांसदों को सरकारी होटलों और उन भवनों में ठहराया जाए, जो उनके राज्यों के नाम पर बने हैं। राष्ट्रपति भवन के छह सौ एकड़ में मंत्रियों के लिए बंगले बन सकते हैं। इससे उनकी सुरक्षा का खर्च भी कम हो जाएगा और वे ज्यादा सुरक्षित भी रहेंगे। अभी तक ऐसा क्यों नहीं हुआ, यह मैं नहीं जानती, लेकिन ऐसा हो सकता है।
यह महत्वपूर्ण कदम उठाने का जितना अनुकूल समय आज है, वैसा पहले शायद ही कभी आया होगा। मंदी का दौर है। यह नौबत आ गई कि सरकार को रिजर्व बैंक से अतिरिक्त पैसा लेना पड़ा। सो राजधानी के लुटियंस जोन को खाली करके वहां निजी निवेशकों को निवेश करने का मौका क्यों न दिया जाए। सरकारी आवास की इस ‘समाजवादी’ परंपरा को समाप्त करके बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है। एक प्रसिद्ध वकील ने मुझे कभी कहा था कि देश के इस सबसे महंगे रिहायशी क्षेत्र को बेचने से इतने पैसे मिल सकते हैं कि हमारे न्यायालयों का नवनिर्माण और पूरा सुधार संभव हो सकता है। ऐसा करने के लिए हिम्मत चाहिए।