साधो, दरवाजे की घंटी बजी। झांककर देखा, तो विक्टोरियन बग्घी पर बैठा समाजवाद मुस्कराता हुआ मुझे देख रहा था। मैंने कहा, नेताजी का जन्मदिन तो बीत चुका। तुम अब भी बग्घी पर बैठे हो? तुम्हारी साइकिल कहां गई?
वह बोला, इस जमाने में लोहिया मार्का समाजवाद नहीं चलेगा। इस देश को अब विक्टोरियन बग्घी वाला समाजवाद चाहिए। इसलिए तो मैं अब भी इसमें घूम रहा हूं। इतना कहकर उस नव अवतरित समाजवाद की बग्घी गांधी समाधि की तरफ मुड़ गई और मैं उसमें जुते घोड़ों की टापों से उठता गुबार देखता रह गया। पड़ोसी ने मुझे बताया कि थोड़े दिनों पहले शहर में समाजवाद का हैपी बर्थडे था। तब सोहर गाने के साथ केक भी काटा गया था।
लोग कहते थे कि समाजवाद के दिन लद गए। पर यहां तो वह विक्टोरिया महारानी वाले देश की बग्घी पर नजर आ रहा है। मैं पहले ही कह रहा था कि इस देश में एक दिन समाजवाद आकर रहेगा। हालांकि कुछ बुद्धिजीवी इस बग्घी मार्का समाजवाद को समाजवाद मानने से इन्कार कर रहे हैं। ऐसा कहने वाले कूढ़मगज हैं। समाजवाद ने नए वस्त्र पहने हैं। तेल-फुलेल चुपड़ा है। बालों में कंघी डाली है। कमर में अंगोछा कसा है। इंग्लैंड की बग्घी पर कोई यों ही थोड़े बैठ जाता है कि सोकर उठे और धम्म-से सवार हो गए। इसके लिए साम्राज्यवादी शऊर की दरकार होती है। पुराने वाले समाजवाद के चक्कर में हमने जिंदगी तबाह कर दी, पर वह नहीं आया। थक-हारकर हम अंग्रेजों की बग्घी वाला समाजवाद ले आए। यह पसंद आएगा।
यह रमपुरिया दिमाग की उपज है। वह देखो इश्क दी गली बिच वाले हिट सोहर पर समाजवादी कुनबा थिरक रहा है। एक घोड़ा भी बिदक कर नाचने को मचल रहा है। घोड़े को समाजवादी लय भा गई है। उसकी टापें पूंजीवाद के सीने को कुचलने के लिए बेचैन हैं। इस तरोताजा समाजवाद की आमद को देखकर जाने कितनी आंखें धन्य हो गईं।
विक्टोरियन बग्घी पर आए दोस्त को कौन सलाम नहीं करेगा? यह तो हमारी पुरानी फितरत है।