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ताकि महफूज रहें बच्चे भी

Fri, 15 Feb 2013 11:42 PM IST
अजय सेतिया
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राष्ट्रीय राजधानी में हुए गैंगरेप के आलोक में जस्टिस वर्मा कमेटी ने जो रिपोर्ट दी, और जिसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने अध्यादेश लागू किया, वह केवल महिलाओं के साथ यौन दुर्व्यवहार के खिलाफ ही नहीं, बाल अधिकारों की रक्षा के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। अपने देश में हर आठवें मिनट पर एक बच्चा गायब हो रहा है। दिल्ली में हर साल पांच सौ से ज्यादा बच्चे गायब हो रहे हैं।
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इस मामले में पहले नंबर पर होने का कलंक महाराष्ट्र के सिर पर है, तो दूसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल आता है और तीसरे नंबर पर दिल्ली। यौन अपराधों के खिलाफ कानून में बदलाव करने के लिए वर्मा कमेटी ने जो सिफारिश सरकार को सौंपी थी, उसमें मानव तस्करी पर भी तवज्जो दी गई है।

केंद्र सरकार ने इसे महत्व दिया और अपने अध्यादेश में खासकर बच्चों की तस्करी के खिलाफ कड़े कानूनी प्रावधान किए। अध्यादेश में साफ कहा गया है कि तस्करी के मामले में बच्चे या उसके अभिभावकों की सहमति का कानूनी तौर पर कोई मतलब नहीं है। ऐसे मामले में अपराधियों को कम से कम सात और अधिकतम दस वर्ष तक की सजा का प्रावधान किया गया है। बाल तस्करी में सरकारी कर्मचारी या पुलिस वाले के शामिल होने पर अध्यादेश में उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया गया है।
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बलात्कार के मामले से जुड़े इस अध्यादेश में बच्चों से जुड़े पहलुओं को प्रभावी ढंग से समझने की जरूरत है। आम तौर पर देखा गया है कि गरीबी से जूझ रहे मां-बाप को लालच देकर बच्चों को खरीद लाया जाता है। लेकिन पुलिस उसे न तो तस्करी मानती है, न खरीदकर लाया हुआ। कई मामलों में तो पुलिस और श्रम विभाग बाल श्रम को गंभीरता से नहीं लेते, वे मामले को टालने की कोशिश ही करते हैं।

ऐसे में, नया अध्यादेश पुलिस और श्रम विभाग के लिए चेतावनी देने वाला है। अध्यादेश में जोड़ी गई धारा 370 में कहा गया है कि तस्करी किए गए बच्चे को श्रम पर लगाने वाले को कम से पांच साल और अधिकतम सात साल की सजा होगी। यानी बाल श्रम कानून के इतर अब भारतीय दंड संहिता की धारा 370 ए में एफआईआर दर्ज की जाएगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की भांति ही नए अध्यादेश में बच्चे की आयु 18 वर्ष ही तय की गई है।

इसी तरह अध्यादेश में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 में भी कुछ नए पहलू जोड़े गए हैं, जो बाल अधिकारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। वैसे तो बच्चों के साथ यौन अपराध करने वालों के लिए तीन से 10 वर्ष तक की सजा का प्रावधान किया गया है। पुलिस और अदालतों के लिए भी स्पष्ट प्रावधान है कि वह किस तरह व्यवहार करेगी।

जैसे-बच्चे का बयान उसके घर या उसकी ओर से तय जगह पर लिया जाएगा, बयान रिकॉर्डिंग की जगह पुलिस वर्दी में नहीं होगी, बच्चों को किसी भी हालत में पुलिस स्टेशन में नहीं रखा जाएगा आदि-आदि। लेकिन पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के एक बाल आश्रम में बच्चों के यौन शोषण का जैसा मामला आया, उसे ध्यान में रखते हुए जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप अध्यादेश की धारा 376 (2) में कहा गया है कि नियंत्रण रखने जैसी जगहों पर बच्चों से यौन अपराध की सजा कम से कम 10 वर्ष और अधिकतम उम्रकैद होगी, और बच्चे की मौत हो जाने की स्थिति में कम से कम 20 साल कैद और अधिकतम उम्रकैद की सजा होगी।

बाल संरक्षण अधिनियम, 2012 में कहा गया था कि मुकदमे की सुनवाई बंद कमरे में होगी और बच्चे को बार-बार शिनाख्त के लिए नहीं बुलाया जाएगा। उसी को आगे बढ़ाते हुए अध्यादेश में भारतीय दंड संहिता की धारा 273 में संशोधन करते हुए कहा गया है कि अगर अवयस्क का बलात्कार या यौन शोषण होता है, तो इसका ध्यान रखा जाए कि पीड़ित का अभियुक्त से सामना न हो। अध्यादेश में जहां महिलाओं के यौन शोषण के मामले में सख्त प्रावधान किए गए हैं, वहीं बाल अधिकारों की रक्षा के लिए भी कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। दरअसल बाल अधिकारों के लिए लड़ रहे संगठनों को सख्त कानून हाथ लगा है, जिसका प्रचार-प्रसार करने के साथ पुलिस को प्रशिक्षित किए जाने की भी जरूरत है।
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