कार फ्री डे के साथ दिल्ली में जब से ऑड-ईवन की शुरुआत हुई है, मैंने कॉलेज के जमाने की साइकिल चलाते हुए अपनी ब्लैक ऐंड ह्वाइट फोटो ड्राइंग रूम में एनलार्ज कराकर लगा दी है। जैसे फेसबुक पर महंगी गाड़ी के साथ किसी बड़े आदमी की पोस्ट बता देती है कि उनका स्टेटस क्या है, उसी तरह साइकिल के साथ मेरी फोटो मेरा स्टेटस बता रही है कि मैं समय के साथ चल रहा हूं।
देखिए, सड़क पर जो कपड़े गरीबी की निशानी हैं, वही फैशन शो में ग्लैमर की पहचान बन जाते हैं। जो दाल हम गरीब की थाली में आने से कतराती है, वही बड़े लोगों की पार्टी में छोटी-सी कटोरी में ढेर सारे कांटिनेंटल डिशेज के साथ बड़े शर्म से परोसी जाती है, और जिसे लोग अपने स्टेटस का खयाल रख किनारे कर देते हैं। उसी तरह जो साइकिल करोड़ों लोगों के आवागमन और रोजी-रोटी का साधन है, और जिसे बड़े लोग कल तक हिकारत से देखते थे, आज वही फैशन में है। बड़े लोग उसे चलाते हुए फोटो खिंचवा रहे हैं। आज साइकिल से चलना वक्त की मांग और स्मार्टनेस की पहचान हो गई है। सो अब यह बाईस सौ से बढ़कर बाईस हजार के रेंज तक आने लगी है, और कौन जाने, भविष्य में बाईस लाख की साइकिलें सड़क पर दौड़ती दिखाई पड़ें। तब टूटी-फूटी साइकिल वाला भी खुद को खास समझेगा, जैसे ढाई लाख की गाड़ी से चलने वाला पचास लाख की गाड़ी को बगल से गुजरते देखकर सोचता है कि कार तो मेरे पास भी है, बस मॉडल और कीमत का फर्क है।
पर स्मार्ट सिटी में तो साइकिल का बोलबाला है, जहां पार्किंग में मजबूरन लगी दस लाख की कार को दो हजार की साइकिल क्रॉस कर शान से निकल जाती है। स्मार्ट सिटी ने पुराने दिन याद दिला दिए हैं, जब लोग साइकिल से चलते थे, सांस लेने के लिए साफ हवा थी, शुद्ध दूध मिलता था और सब्जियों में केमिकल नहीं मिलाया जाता था, जब दाल-रोटी सबको सुलभ थी, और जब रिश्ते बिना फ्रैंड रिक्वेस्ट के ही बन जाते थे। स्मार्ट सिटी के स्मार्ट दौर में कार वाले भी साइकिल खरीदने की सोच रहे हैं।