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बड़ी राह पर एक छोटा कदम

Thu, 17 Oct 2013 07:02 PM IST
जगदीश उपासने
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पहली बार वोट डालने को तैयार 12 करोड़ नए मतदाताओं समेत देश के मतदाताओं को सर्वोच्च न्यायालय ने किसी भी उम्मीदवार को स्वीकार न करने का जो अधिकार ईवीएम मशीन में ‘उपरोक्त में से कोई नहीं’ (नन ऑफ द अबव या नोटा) के बटन के रूप में दिया, वह चुनावी प्रक्रिया को दोषरहित बनाने के लिहाज से बहुत छोटा अधिकार है। इसके इस्तेमाल से चुनाव के नतीजे पर भी फर्क नहीं पड़ने जा रहा। लेकिन इस छोटे कदम ने चुनाव प्रक्रिया में सुधार और लोकतंत्र को सही अर्थों में जनसहभागिता वाला बनाने की राह खोल दी है।
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ऐसे सुधार विधायिका और कार्यपालिका से आने चाहिए, लेकिन चुनाव सुधारों के प्रति राजनीतिक दलों की जबर्दस्त अनिच्छा से यह पहल अदालतों के हाथ आ गई। कुल जमा ढाई महीने के अंतराल में सुप्रीम कोर्ट ने ‘नोटा’ समेत एक के बाद एक चार ऐसे फैसले सुनाए, जो लोकतंत्र की बुनियाद—मतदाता—को मजबूत करते हैं, लोकतंत्र में उनकी सहभागिता बढ़ाते हैं और राजनीति के शुद्धीकरण के उपाय करते हैं। गंभीर अपराधों में दो साल या उससे ज्यादा सजा होते ही जनप्रतिनिधि की सदस्यता खत्म होना, गिरफ्तार व्यक्ति पर चुनाव लड़ने की पाबंदी और अपना संपूर्ण वित्तीय, शैक्षणिक और आपराधिक रिकॉर्ड निर्वाचन फार्म में न भरने वाले प्रत्याशी का नामांकन रद्द होना जैसे फैसलों के साथ ही सर्वोच्च अदालत ने चुनाव के वक्त मुफ्त वस्तुएं बांटने जैसे लोकलुभावन उपायों की घोषणा से राजनीतिक दलों को रोकने का कानून बनाने की सलाह भी संसद को दी है।

सरकार या राजनीतिक दल ऐसी किसी सलाह को नहीं मानते, जो उनको चुनाव जीतने के लिए मनमानी करने से रोकती है। ‘नोटा’ को ही लीजिए। विधि आयोग ने 1999 में तब के कानून मंत्री राज जेठमलानी को दी गई 170वीं रिपोर्ट में नकारात्मक मतदान की सिफारिश की थी। फिर 2001 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी एस कृष्णमूर्ति ने नकारात्मक या निरपेक्ष (न्यूट्रल) मतदान का अधिकार देने की सिफारिश सरकार से की। निर्वाचन नियमों में यह प्रावधान करने के लिए विधि मंत्रालय को संसद के सामने जाने की जरूरत नहीं थी, फिर भी यह प्रस्ताव फाइलों में दबा रहा।
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संविधान की कार्यक्षमता की समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम एन वेंकटचलैया की अगुवाई में बने राष्ट्रीय आयोग ने एक कदम आगे जाकर केंद्र और चुनाव आयोग को इस सुझाव पर गौर करने को कहा कि उसी प्रत्याशी को विजयी घोषित किया जाना चाहिए, जिसे कुल मतदान के 50 फीसदी से कम-से-कम एक वोट अधिक मिला हो। ‘नोटा’ के लागू होने के साथ ही अनिवार्य मतदान की भी आवाजें उठी हैं। कई देशों में मतदान अनिवार्य है भी। गुजरात में नरेंद्र मोदी ने मतदान को अनिवार्य करने की व्यवस्था कर रखी है। पर अनिवार्यता से कर्तव्यबोध संभव नहीं। अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक रूप से सक्रिय देश में भी राष्ट्रपति चुनाव में मतदान का प्रतिशत घटा है। दरअसल मतदान जनजागृति का मामला है, जो मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने से शुरू होता है।

दिक्कत यह है कि ‘नोटा’ के वोट ‘अमान्य’ के बतौर गिने जाएंगे, इसलिए अपनी मर्जी के उम्मीदवार उतारने वाले दल अभी ‘नोटा’ की दखल नहीं लेने वाले, क्योंकि उनके उम्मीदवार ने बाकी से अधिक वोट पाए, तो जीतेगा वही, चाहे ‘नोटा’ के वोटर बहुसंख्या में क्यों न हों। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने यह उम्मीद ठीक ही जताई है कि जब ‘नोटा’ के वोट सबसे अधिक होने लगेंगे, तो उस चुनाव क्षेत्र में नए उम्मीदवारों के साथ चुनाव कराने की मांग जरूर जोर पकड़ेगी। इसे न मानने पर जनरोष बढ़ सकता है और तब सुप्रीम कोर्ट भी दखल देने को मजबूर होगा। वजह यह कि कोर्ट ने मतदान के अधिकार को अभिव्यक्ति का अधिकार यानी मौलिक या सांविधानिक अधिकार माना है। इस व्याख्या की पृष्ठभूमि में कोई व्यक्ति या संगठन फिर से अदालत में दलील दे कि ‘नोटा’ की अधिकता वाले चुनाव क्षेत्र में नए प्रत्याशियों के साथ नए सिरे से चुनाव नहीं कराना अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन है, तो संभव है कि कोर्ट उस पर अनूकूल रुख दिखाए और ‘नोटा’ को नकारात्मक वोट या सभी प्रत्याशियों की अस्वीकार्यता के अधिकार में बदल दे। यह पड़ाव दूर है, पर सफर शुरू हो चुका है।

अजीब बात यह है कि चुनाव सुधारों की यात्रा संसद से शुरू होने के बजाय चुनाव आयोग से शुरू हुई। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन का युग याद कीजिए, जब राजनीतिक दलों और मतदाताओं को समझ में आया कि लोकतंत्र में चुनाव होते क्या हैं। उसके बाद व्यापक चुनाव सुधारों की मांग जैसे-जैसे जोर पकड़ती गई, सत्ता और राजनीतिक तंत्र उसे भोथरा करता रहा। अब तो चुनाव सुधार का काम एक तरह से सुप्रीम कोर्ट के ही जिम्मे हो गया है। यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ठीक ही कहते हैं कि अदालतें कानून नहीं बना सकतीं। लेकिन विधायिका में जनता के उचित और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व के बजाय निहित स्वार्थों, ताकतवर लोगों तथा अपराधी तत्वों की नुमाइंदगी होने लगे, तब वाजिब कानून कौन बनाए, अनुचित प्रावधानों में सुधार कौन करे? फिर भी व्यापक चुनाव सुधार अदालतों की नहीं, संसद की जिम्मेदारी है। विधि-निर्माताओं को चुनावों में बढ़ते खर्च तथा उससे होने वाली कालेधन की उपज, पार्टियों की धन-उगाही, पेड न्यूज जैसे चुनाव सुधार के और भी बड़े मसलों का हल खोजना है। वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे, तो सर्वोच्च अदालत से और अधिक दखल की मांगें उठेंगी।
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