संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में विश्व खाद्य उत्पादन का आकलन करते हुए बताया है कि इस वर्ष फसलों का उत्पादन हाल के वर्षों में सबसे चिंताजनक रहने की आशंका है। विश्व खाद्य संगठन के विशेषज्ञों ने कहा है कि विश्व में प्रमुख अनाज के भंडार कम हो रहे हैं और कीमतें बढ़ रही हैं।
हालांकि इस स्थिति के लिए अमेरिका और यूरोप के बड़े हिस्से के साथ ही कुछ अन्य प्रमुख खाद्य उत्पादक क्षेत्रों में प्रतिकूल मौसम को जिम्मेदार ठहराया गया है, पर यह अर्द्धसत्य ही है। जहां यह सही है कि जलवायु बदलाव के इस दौर में मौसम में अप्रत्याशित बदलाव सामने आ रहा है, वहां यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि अनुचित कृषि तकनीक अपनाने के कारण कई दीर्घकालीन समस्याएं उत्पन्न हुईं, जो अब खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर रही हैं।
अमेरिका और यूरोप विश्व के बड़े खाद्य उत्पादक जरूर हैं, पर उन्होंने औद्योगिक खेती के जिस मॉडल को अपनाया, उसका मिट्टी के प्राकृतिक उपजाऊपन पर प्रतिकूल असर पड़ा और पानी की अत्यधिक खपत हुई। अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा अनाज उत्पादक तो है, पर साथ ही यह भी सच है कि उसके अनेक विशाल जलभंडार लुप्त हो रहे हैं और बहुत-सी कृषि भूमि के उपजाऊपन का बुरी तरह ह्रास हो चुका है।
इस तरह कृषि तथा खाद्य उत्पादन का आधार क्षतिग्रस्त हुआ और प्रतिकूल मौसम में तो यह क्षति और भी गंभीर परिणाम उत्पन्न करती है। कृषि के इस मॉडल को अमेरिका ने विकासशील देशों की ओर धकेला, जिससे वहां भी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई। भारत जैसे देश में तो रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाओं के अधिक उपयोग तथा जल के दोहन पर आधारित कृषि विकास के कारण अन्य गंभीर समस्याएं भी उत्पन्न हुईं, क्योंकि हमारा देश मूलतः छोटे किसानों का देश है। छोटे किसानों की महंगी तकनीकों पर बढ़ती निर्भरता ने उन्हें कर्जदार बनाया और उनकी जमीन भी छिनने लगी।
इन परिस्थितियों में व छोटे किसानों से होने वाले कई स्तरों पर अन्याय के कारण छोटे किसानों और भूमिहीन खेत मजदूरों, दोनों की स्थिति हाल के वर्षों में बिगड़ती गई। इस तरह देश के जो परिवार खाद्य उत्पादन के लिए सबसे अधिक मेहनत करते हैं, वे स्वयं ही भूख, कुपोषण व आर्थिक संकट से पीड़ित हैं। उपजाऊ भूमि के दुरुपयोग, मिट्टी के उपजाऊपन के ह्रास, बढ़ते जल संकट व गांवों के बिगड़ते पर्यावरण के कारण भविष्य में खाद्य उत्पादन बढ़ पाने की संभावनाओं पर भी कई प्रश्नचिह्न लग गए हैं। जो रही-सही कसर बाकी है, वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रसार, बीजों पर कब्जा करने के उनके प्रयासों और जीएम फसलों जैसी खतरनाक तकनीकों को फैलाने की उनकी तिकड़मों ने पूरी कर दी।
इन सब बढ़ती समस्याओं के बीच खाद्य सुरक्षा पर होने वाली चर्चा में प्रायः इस मुद्दे पर ध्यान केंद्रित है कि कितने प्रतिशत लोगों को सस्ता अनाज दिया जा सकेगा। यह खाद्य सुरक्षा की एक संकीर्ण समझ है। खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे पहले किसानों की सुरक्षा का आधार चाहिए, क्योंकि आज तो किसान ही संकट में फंसा हुआ है।
देश-दुनिया में तमाम ऐसे उदाहरण सामने आ रहे हैं, जहां पर्यावरण की रक्षा से जोड़कर खेती करने से किसानों का खर्च बहुत कम तो हुआ ही, उत्पादन भी टिकाऊ तौर पर बढ़ा है। हमें ध्यान इस ओर देना है कि गांव में उपलब्ध संसाधनों का ही बेहतर से बेहतर उपयोग करते हुए परंपरागत बीजों, कंपोस्ट खाद व हानिकारक कीड़े दूर रखने के स्थानीय उपायों से खेती को आगे बढ़ाएं। जहरीले उत्पादों से दूरी बनाएं, ताकि केंचुए, तितली, मधुमक्खी जैसे किसानों के मित्र कीट व पक्षी पहले जैसी उपयोगी भूमिका निभाते रहें।
भूमिहीन खेत मजदूरों को भी कम से कम दो-तीन बीघे जमीन देकर छोटे किसान की श्रेणी में लाना चाहिए। छोटे और मध्यम किसानों को पूरे देश का सम्मान मिलना चाहिए और उनके हितों के अनुकूल कृषि नीतियां अपनाकर उनकी आर्थिक स्थिति और खाद्य उत्पादन, दोनों को साथ-साथ बढ़ाना चाहिए। इस तरह खाद्य उत्पादन भी बढ़ेगा और गांवों से भूख व कुपोषण भी दूर होंगे।