कुछ दिनों पहले मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा था, 'भारत 2020-21 में चालू खाते में अधिशेष (सरप्लस) दर्ज कर सकता है।' उन्होंने यह भी कहा था, 'पहली तिमाही (अप्रैल-जून, 2020) में हमारे पास 19.8 अरब डॉलर का अधिशेष था और यदि आने वाली तिमाहियों में हम इस तरह का प्रदर्शन न भी देखें, तब भी हमारे पास चालू खाते में अधिशेष हो सकता है।'
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने इसे 'अंडर हीटिंग' अवधारणा बताया। इसका मतलब है कि मांग ध्वस्त हो गई है और कम से कम अब तक सरकार के कथित प्रोत्साहन पैकेज (बेहद मामूली और खराब तरीके से लक्षित) मांग को पुनर्जीवित करने में नाकाम रहे हैं। मांग से संबंधित एक पैमाना यह है : ऊर्जा मंत्री के मुताबिक 2021-22 में तापीय बिजली संयंत्रों में प्लांट लोड फैक्टर (किसी संयंत्र में औसत बिजली उत्पादन तथा किसी निश्चित अवधि में अधिकतम उत्पादन के बीच का अनुपात) के 56.5 फीसदी तक पहुंचने की उम्मीद है। 'अंडर हीटिंग' के बावजूद खुदरा महंगाई दर 7.61 फीसदी तथा खाद्य महंगाई दर 11.07 फीसदी रही, जिससे गरीबों पर बोझ बढ़ गया।
रोजगार की चुनौतियां
कृषि क्षेत्र में ही उम्मीद की किरण नजर आती है। 2020 में हमारे यहां रबी की फसल के रूप में 14.8 करोड़ टन खाद्यान्न का बंपर उत्पादन हुआ और खरीफ फसल के रूप में 14.4 करोड़ टन खाद्यान्न के उत्पादन का अनुमान है। इस साल ट्रैक्टर की बिक्री में नौ फीसदी वृद्धि होने का अनुमान है। एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) कंपनियों के मुताबिक शहरी मांग की तुलना में ग्रामीण मांग बेहतर है। फिर भी, ग्रामीण मजदूरी वृद्धि दर में बढ़ोतरी नहीं हो रही है। लिहाजा तस्वीर मिली-जुली है, लेकिन इससे हमारी वृहत आर्थिकी का मूल्यांकन विकृत नहीं होना चाहिए। पूरी अर्थव्यवस्था खराब स्थिति में है, नीति निर्धारण भ्रमित है और पुनरुद्धार के दावे अतिरंजित हैं। वास्तविक मानदंड रोजगार और पारिश्रमिक/आय से जुड़े हैं।
सीएमआईई (सरकार के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं) के मुताबिक मौजूदा बेरोजगारी दर 6.68 फीसदी है। इसे श्रमिक भागीदारी दर के साथ पढ़ें, जो कि 41 फीसदी है और महिला श्रमिकों की भागीदारी दर 25 फीसदी है। सौ नियोजित लोगों में सिर्फ 11 महिलाएं हैं; लेकिन जिन प्रत्येक 11 लोगों की नौकरियां गई हैं, उनमें चार महिलाएं है। सितंबर, 2019 से सितंबर, 2020 के दौरान 1.1 से 1.2 करोड़ लोग श्रम बल से बाहर हो गए।
अमीरों के प्रति पक्षपात
अर्थव्यवस्था की 'अंडर हीटिंग', इसकी 'ओवर हीटिंग' जैसी ही खराब है। अर्थव्यवस्था की जब ओवर हीटिंग होती है, तो महंगाई बढ़ती है, ब्याज दरें इस तरह बढ़ती हैं, जिससे मांग खत्म होती है, कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और यदि सुचारू रूप से काम करने वाला बाजार हो और सुधारात्मक कदम उठाए जाएं, तो मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन कायम होता है। और जब 'अंडर हीटिंग' हो तब क्या होता है? भारत के लिए यह नई चुनौती है और मौजूदा सरकार इससे निपटने में अक्षम नजर आ रही है। वजह है सरकार गरीबों की मदद करने के बजाय कॉरपोरेट को खुश कर रही है। यदि मैं एक ही उदाहरण सामने रखूं, तो कॉरपोरेट्स को कर छूट के रूप में 1,45,000 करोड़ रुपये का भारी तोहफा दिया गया है। जबकि यह धन गरीबों को मुफ्त राशन या नकद हस्तांतरण के रूप में दिया जा सकता था। कॉरपोरेट्स ने इस धन का इस्तेमाल अपना कर्ज कम करने और नकदी बढ़ाने में किया। उन्होंने इसका निवेश नहीं किया। यदि गरीब लोगों को यह धन मिलता, तो वे भूखों नहीं मरते, जैसा कि तीन महीने के दौरान हफ्ते में कई दिनों तक उन्हें रहना पड़ा था। वे इस धन से भोजन, दूध, दवाएं और अन्य आवश्यक वस्तुएं खरीदते और कुल मिलाकर मांग में बढ़ोतरी करते।
चालू खाते में अधिशेष है, क्योंकि निर्यात आयात से अधिक हो गया, हालांकि अतीत के मानदंडों में ये दोनों अभी कम ही हैं। कम व्यापार मात्रा, चालू खाते में अधिशेष और रुपये के मूल्य में वृद्धि का अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ सकता है। इसका पहला निशाना होगा रोजगार। इसका अदृश्य वृहत आर्थिकी प्रभाव यह होगा कि भारत की दुर्लभ पूंजी विदेशों में निवेश की जाएगी। आप उस विकासशील देश की कल्पना कीजिए, जिसे बेताबी के साथ पूंजी की जरूरत है, मगर वह वास्तव में अपनी पूंजी दूसरे देशों में निवेश के लिए भेज रहा है!
आत्मनिर्भरता या निरंकुशता
मैं गंभीरता से सोचता हूं कि आत्मनिर्भरता के विचार को आगे बढ़ाने वालों ने ऐसे नतीजे की उम्मीद नहीं की थी। आत्मनिर्भर से आशय आत्म-निर्भरता से है, तो हमें इसका स्वागत करना चाहिए। लेकिन यदि नीति और अभ्यास के रूप में आत्मनिर्भर का अर्थ संरक्षणवाद, मुक्त व्यापार विरोधी, उच्च दरें, निरंकुशता, लाइसेंस और नियंत्रण की वापसी, मनमाने तथा पक्षपाती नियमों से है, तो फिर यह निश्चित रूप से तबाही की ओर ले जाएगा। मैं उम्मीद करता हूं कि मोदी ट्रंप को पीछे नहीं छोड़ेंगे।
हम एक अजीब दुनिया में रहते हैं, जहां कम्युनिस्ट चीन के राष्ट्रपति मुक्त व्यापार और वैश्वीकरण के गुणों पर वाक्पटुता से बोलते हैं और पूंजीवादी अमेरिका के राष्ट्रपति व्यापार समझौतों, विश्व व्यापार संगठन, मुक्त व्यापार, जलवायु परिवर्तन और पेरिस समझौते का उपहास उड़ाते हैं! क्या दुनिया को सबसे ऊपर रखा जा रहा है? क्या दुनिया उलट-पुलट गई है?
अर्थशास्त्री प्रोफेसर राज कृष्ण ने जिस 'हिंदू विकास दर' की बात की थी, उससे आगे बढ़ने में भारत को तीन दशक लग गए। हालांकि मैं मानता हूं कि चोल शासकों और मौर्य शासकों जैसे प्राचीन काल के हिंदू राजा दूरदर्शी थे और उन्होंने भारत की आर्थिक पहुंच का विस्तार करते हुए उसे चीन, इंडोनेशिया और रोम तक पहुंचाया था। उनमें सचमुच वैश्विक दृष्टि थी और उन्होंने दुनिया की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में भारत की हिस्सेदारी को 25 फीसदी तक पहुंचाया था। उन साम्राज्यवादी दिनों में-जब हमारे पास प्रशिक्षित अर्थशास्त्री नहीं होते थे- भारत ने मुक्त व्यापार को अपनाया, नए बाजारों पर कब्जा किया और भारत के भीतर स्थित कई राष्ट्रीयताओं की संपत्ति में वृद्धि की।
मुझे लगता है कि हम उस समृद्ध विरासत की ओर से पीठ मोड़ रहे हैं और ऐसी नीतियां अपना रहे हैं, जो हमें कम विकास दर के दौर में वापस ले जाएगी। ऑक्सफोर्ड के अर्थशास्त्रियों ने हमें चेतावनी दी है कि अगले पांच वर्षों में भारत औसतन 4.5 फीसदी विकास दर का गवाह बन सकता है। यह खतरे की घंटी है।