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क्या परोस रहा है छोटा परदा

Sun, 11 Aug 2013 08:46 PM IST
उर्मिलेश
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टीवी चैनलों के हास्य या कॉमेडी कार्यक्रमों का लुत्फ उठाने के लिए अपने ड्राइंग रूम में बैठे परिवार के वरिष्ठ सदस्यों को कई बार अपने बाल-बच्चों के बीच अचानक शर्मिंदगी महसूस होती है। कई मौकों पर हंसने के बजाय उन्हें गुस्सा आता है कि मनोरंजन के नाम पर क्या-क्या दिखाया जा रहा है! कई लोग तो रिमोट दबाकर कुछ देर के लिए किसी अन्य चैनल पर चले जाते हैं। लेकिन यह मसले का समाधान नहीं है।
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खासतौर पर ऐसे समाज में, जहां आज भी टीवी मनोरंजन उद्योग के लिए कोई कारगर निगरानी तंत्र विकसित नहीं किया जा सका है। इन दिनों सिर्फ कॉमेडी और हास्य ही नहीं, तमाम तरह के मनोरंजन कार्यक्रमों, रियलिटी शो में बेहद भद्दे, अश्लील और कामुक किस्म के प्रसंग जबरन भरे जा रहे हैं। टीवी मनोरंजन उद्योग पर नजर रखने के लिए चैनल संचालकों की तरफ से बनाई ब्रॉडकास्टिंग कंटेंट कंप्लेंट्स काउंसिल या बीसीसीसी को पिछले कुछ महीनों में इस तरह के कार्यक्रमों के खिलाफ 10,983 शिकायतें मिली हैं। अगर आम लोगों को मालूम होता कि शिकायत दर्ज कराने के लिए ऐसी कोई संस्था है और इसका दायरा सिर्फ निगरानी और सुझाव देने तक सीमित न होकर कारगर हस्तक्षेप का भी है, तब शायद शिकायतों की संख्या लाखों में होती।

फिल्म उद्योग के लिए सेंसर बोर्ड के रूप में एक निगरानी नियंत्रक है। टीवी मनोरंजन उद्योग के लिए सेंसर बोर्ड की जरूरत नहीं है। पर उसे पूरी तरह छुट्टा क्यों छोड़ा जाए? सरकारें अनेक मौकों पर कानून का बेजा इस्तेमाल बेधड़क करती रहती हैं। सोशल साइट्स के खिलाफ वे आक्रामक नजर आती हैं। पर टीवी मनोरंजन उद्योग पर हमेशा मेहरबान है वह। क्या सरकारी एजेंसियां अश्लीलता और बेवजह की हिंसा को कोई मसला नहीं मानतीं? क्या इसलिए कि इस तरह के कार्यक्रम कम से कम मौजूदा व्यवस्था की सड़ांध पर सवाल नहीं उठाते? क्या इसलिए कि ऐसे कार्यक्रम मनोरंजन के साथ लोगों के ज्ञान और संवेदना के विस्तार और विकास के उपकरण नहीं बनते? इसके बजाय वे आम लोगों के बीच अज्ञान, अंधविश्वास और अंधेरा बांटते हुए व्यवस्था की कमियों पर सवाल उठाने की जन क्षमता को कुंद करते हैं। वे व्यवस्था के समक्ष कोई वैचारिक चुनौती पेश नहीं करते।
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न्यायमूर्ति ए पी शाह की अध्यक्षता वाली गैरसरकारी काउंसिल को मिली शिकायतों में करीब 73 फीसदी हिंसा, अश्लीलता और बदजुबानी को बढ़ावा देने से संबंधित बताई गई है। यह प्रवृत्ति सिर्फ मनोरंजन चैनलों तक सीमित नहीं, कई समाचार चैनल बुरी तरह इसकी जद में आ गए हैं। उन्हें देखते हुए पता नहीं चलता कि समाचार और करेंट अफेयर्स दिखाते हुए वे कब अचानक मनोरंजन चैनल में तब्दील हो जाएंगे! कुछ चैनलों ने अपराध कथा के नाम पर हिंसा, तो कुछ ने फिल्म नगरी के समाचार के नाम पर भौंडे किस्म के शो परोसना जारी रखा है। कुछेक ने तो अंधविश्वास के कार्यक्रमों को ही अपनी सफलता का मंत्र बना लिया है। जो शुद्ध मनोरंजन चैनल हैं, उनके बारे में कहना ही क्या!

पर हमारे टीवी उद्योग से जुड़े मित्रों, बड़े सीईओ और चैनल प्रमुखों को इसमें कहीं कोई परेशानी नजर नहीं आती। वे अश्लीलता और हिंसा के आरोपों को यह कहते हुए खारिज करते हैं कि टीवी का रिमोट दर्शक के हाथ में है, कार्यक्रम अच्छा न लगे, तो वह रिमोट घुमाए और अगले चैनल पर चला जाए। मतलब यह कि निर्माता-निर्देशक का कोई सामाजिक-सांस्कृतिक दायित्व नहीं। सजग-सतर्क तो दर्शकों को ही रहना होगा! ऊपर से मासूम दिखने वाले इस तर्क में कुतर्क ज्यादा है। यह कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसे कोई कहे कि विषैले खाद-रसायनों की अतिशय खुराक देकर पैदा की गई सब्जियों, फलों और अनाज से आपकी सेहत को खतरा लगे, तो आप ऑर्गेनिक फूड खाइए। इस तरह का तर्क देकर चैनल संचालक और निर्माता अपनी विफलता छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। समाज, पर्यावरण, देश-दुनिया, राजनीति, विज्ञान और अंतरिक्ष से जुड़े न जाने कितने मनोरंजक और रोमांचक विषय हैं, जिन पर टीआरपी बटोरने की अभूतपूर्व क्षमता वाले कार्यक्रम बनाए जा सकते हैं। लेकिन ज्यादातर निजी चैनलों के बीच अश्लीलता परोसने की होड़ मची हुई है।

सिर्फ किसी सरकारी नियंत्रक या स्वनियंत्रण के किसी तंत्र से भारतीय टीवी उद्योग को पटरी पर नहीं लाया जा सकता। इसके लिए स्वायत्त पब्लिक तंत्र की जरूरत है। न्यायमूर्ति शाह की अध्यक्षता वाली काउंसिल इस दिशा में ठोस कदम उठा सकती है। सूचना प्रसारण मंत्रालय के समर्थन-सहयोग से ऐसी काउंसिलों को ज्यादा अधिकार संपन्न बनाए जाने की जरूरत है। इसके जरिये मनोरंजन चैनलों की स्वायत्तता को अक्षुण्ण रखते हुए उनके कार्यक्रमों की गुणवत्ता और उनके विषयवस्तु पर निगरानी रखी जा सकती है। न्यूज चैनलों के लिए मीडिया काउंसिल या मीडिया कंप्लेन काउंसिल जैसी स्वायत्त संस्थाओं का प्रस्ताव पहले से ही चर्चा में है।

ऐसी समितियों या काउंसिलों में नियुक्ति या मनोनयन का अधिकार न तो सिर्फ सरकार के पास रहे, न सिर्फ ब्रॉडकास्टर्स के पास। इसके लिए एक सरकार समर्थित स्वायत्त काउंसिल हो। इसकी अध्यक्षता ख्यातिलब्ध न्यायाधीश या समाजशास्त्री करे। इसके सदस्यों के मनोनयन में सरकार और ब्रॉडकास्टर्स, दोनों को ज्यादा संजीदा होना होगा। ऐसे लोगों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करके निगरानी और नियमन के मंचों को सार्थक और कारगर बनाया जा सकता है। सरकार और उसकी संबद्ध एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि इन मंचों की सिफारिशों का कड़ाई से पालन हो। तभी स्थिति बेहतर हो सकती है।
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