चुनावों के दौरान, हारने वाले उम्मीदवारों द्वारा ईवीएम पर संदेह जताया गया है। क्या ईवीएम से छेड़छाड़ संभव है? 1989 में जब मशीनों को चुनाव में उपयोग के लिए मंजूरी दी गई थी, तब से अब तक ईवीएम द्वारा 100 से अधिक चुनाव कराए जा चुके हैं। किसी एक चुनाव में जीतने वाला किसी अन्य चुनाव में हार जाता है और हारने वाला जीत जाता है। इन वर्षों में, इन्हीं लोगों ने एक समय मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा किया है, तो किसी दूसरे समय मशीनों के इस्तेमाल का मजाक उड़ाया है। लोगों द्वारा फर्जी संदेह खड़े किए जा रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि कोई छेड़छाड़ कर सकने वाली मशीन बना सकता है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या चुनावों में इस्तेमाल होने वाली मशीनों से छेड़छाड़ हो सकती है या नहीं।
यदि दावा विश्वसनीयता के बारे में है, तो आरोप लगाने वालों के पास प्रमाण होने चाहिए। आइए, देखते हैं कि भारतीय ईवीएम की सशक्तता के क्या कारण हैं? सबसे पहले तो, किसी भी तरीके से ईवीएम को इंटरनेट या मोबाइल या उस जैसी अन्य वायरलेस संचार डिवाइस से नहीं जोड़ा जा सकता। इसलिए किसी भी अदृश्य संचार डिवाइस को इससे जोड़ा ही नहीं जा सकता। विज्ञान का कोई साधारण छात्र भी बता सकता है कि वायरलेस संचार के लिए युग्मन एंटीना की जरूरत होती है और ईवीएम में कोई अलग एंटीना नहीं होता। यह सुनिश्चित करता है कि ईवीएम से बाहर से संपर्क नहीं किया जा सकता। कुछ लोगों का आरोप है कि 'मैल्वेयर' को मशीन में डाला जा सकता है, क्योंकि यह कंप्यूटर में होता है। ईवीएम में चूंकि इंटरनेट या वायरलेस प्रणाली से संपर्क स्थापित करने का कोई विकल्प ही नहीं है, इसलिए यह तुलना उचित नहीं है।
ईवीएम की प्रक्रिया को बदलने वाली कुछ छिपे हुए बटनों के बारे में भी संदेह व्यक्त किया गया है। यदि ऐसा होता तो क्या 100 से भी अधिक चुनावों में 20 वर्षों तक लगातार इस्तेमाल के बाद यह छिपा रह पाता, तो क्या इसे बड़े पैमाने पर अपनाया जाता? इस तरह के संदेहों के निवारण के लिए निर्वाचन आयोग ने नकली चुनाव का, मशीनों को सील करना और चुनावों में सिर्फ विभिन्न राजनीतिक एजेंटों द्वारा प्रमाणित मशीनों का इस्तेमाल जैसी विभिनन प्रक्रियाएं आयोजित की हैं। यदि मशीनों के साथ छेडछानी की जाती है, तो ये एजेंट मशीनों के प्रमाणीकरण के दौरान क्या करते हैं? विभिन्न न्यायालयों ने अनेक याचिकाओं का निपटारा करते हुए ईवीएम पर पूर्ण आस्था व्यक्त की। चुनाव आयोग ने ईवीएम में मतदाता सत्यापन पत्र लेखा परीक्षा (वीवीपीएटी) जोड़ने के लिए कई और कदम उठाए हैं। यह भली-भांति एक दृश्य विंडो और उसके नीचे सीलबंद बॉक्स के साथ लगा बंद किया हुआ प्रिंटर है। जब मतदाता कुंजी को दबाकर अपना मत देता है, तो एक मुद्रित पर्ची निकलती है, जिसे दृश्य विंडो में देखा जा सकता है और उसके बाद काटकर मुहरबंद बक्से में जमा कर दिया जाता है। मतदाता को पर्ची देखने नहीं दी जाती है। मशीन द्वारा पंजीकृत प्रत्येक वोट को संबंधित प्रिंटर में भेजा जाता है और मशीन से प्राप्त परिणाम को पर्ची की गणना से सत्यापित किया जा सकता है। ऐसी कई वीवीपीएटी मशीनों का हाल ही में संपन्न चुनावों में इस्तेमाल किया गया है। यह भी ध्यान देना दिलचस्प है कि चुनाव आयोग की स्थापित प्रक्रिया के बाबजूद भी किसी उम्मीदवार ने इन पर्चियों की गिनती के लिए नहीं कहा था। क्या यह मशीनों की विश्वसनीयता के लिए पर्याप्त नहीं है?
लेखक आईआईटी, भिलाई के निदेशक और सीडीएसी के पूर्व डीजी तथा चुनाव आयोग के ईवीएम तकनीकी एक्सपर्ट ग्रुप के सदस्य हैं।