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एक संघर्ष के साठ साल

बनवारी Updated Tue, 03 Apr 2018 06:59 PM IST
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तिब्बती संघर्ष

दलाई लामा तिब्बत से निर्वासित होकर 30 मार्च, 1959 को भारत आए थे। उस समय कोई 80 हजार तिब्बतियों ने भारत में शरण ली थी। भारत में उनके प्रवास के 60 वर्ष बीत चुके हैं। इन 60 वर्षों के प्रवास के लिए भारत को धन्यवाद देने के लिए तिब्बतियों की निर्वासित सरकार ने पूरे वर्ष ‘धन्यवाद भारत’ कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया था। इसका पहला कार्यक्रम 31 मार्च को राजधानी दिल्ली में होना था। उसमें मनमोहन सिंह व लालकृष्ण आडवाणी सहित अनेक प्रमुख राजनेताओं को बुलाने की योजना थी। पर भारत सरकार को लगा कि इन समारोहों में किसी राजनेता द्वारा असावधानीवश कोई बात कही गई, तो उसका भारत-चीन संबंधों पर बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए कैबिनेट सचिव की ओर से एक गोपनीय पत्र केंद्र सरकार के विभागों और राज्य सरकारों को भेजा गया कि इन समारोहों में राजकीय स्तर पर साझेदारी न की जाए। भारत सरकार का संकेत समझकर तिब्बत की निर्वासित सरकार ने दिल्ली में होने वाला कार्यक्रम धर्मशाला स्थानांतरित कर दिया। लगता है, केंद्र सरकार ने भी इन कार्यक्रमों को लेकर अपनी नीतियों में कुछ परिवर्तन किया है। धर्मशाला के कार्यक्रम में केंद्र सरकार में मंत्री महेश शर्मा और भाजपा के राम माधव व शांता कुमार सम्मिलित हुए। अगर केंद्र सरकार ने अपनी नीति में यह परिवर्तन न किया होता, तो इससे काफी गलत संदेश गया होता।



समारोह में दलाई लामा ने संयत और नपे-तुले शब्दों में अपनी बातें कही। विश्व भर में फैले हुए लगभग डेढ़ लाख तिब्बतियों की पीड़ा और चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि पता नहीं और कब तक तिब्बतियों को अपने घर लौटने के लिए संघर्ष करते रहना पड़ेगा। इस समय लगभग 95 हजार तिब्बती भारत में रह रहे हैं और शेष दुनिया भर में फैले हुए हैं। उनके संघर्ष को दुनिया भर में समर्थन मिला है। दलाई लामा को उनकी धार्मिक और दार्शनिक बातें सुनने और तिब्बतियों के राजनीतिक संघर्ष का समर्थन करने के लिए  दुनिया भर में आमंत्रित किया जाता रहा है। लेकिन चीन के कम्युनिस्ट शासकों ने सदा उनके लिए अपशब्दों का ही उपयोग किया है। चीन तिब्बत को अपना एक प्रांत समझता है और स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले तिब्बतियों को देशद्रोही। चीन की सामरिक शक्ति को देखते हुए दलाई लामा ने तिब्बत की स्वतंत्रता का विचार छोड़ दिया था। स्वतंत्रता की जगह अब वही उसकी स्वायत्तता की बात करते हैं। इस समारोह में भी उन्होंने अपनी यह बात दोहराई और उसके साथ जोड़ा कि जब तक तिब्बतियों की जातीय भावना जीवित है, वे तिब्बत लौटने और स्वायत्त होकर अपना जीवन जीने का सपना देखते रहेंगे।


चीन की बढ़ती हुई शक्ति और तिब्बत में उसकी सामरिक और प्रशासनिक उपस्थिति को देखते हुए अभी तिब्बत की स्वतंत्रता या स्वायत्तता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारत के प्रति चीन ने जो वैमनस्य पाल रखा है, उसका एक बड़ा कारण उसका यह भय है कि भारत तिब्बत की मुक्ति में कोई भूमिका निभा सकता है। चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण के बाद अपने परिवहन तंत्र का विस्तार किया है। वह ल्हासा तक रेल लाइन बिछा चुका है और अब वह नेपाल की सीमा तक उसका विस्तार करना चाहता है। तिब्बत के सुदूर क्षेत्रों तक उसने ऐसी सड़कों का जाल बिछा दिया है, जिन पर भारी सैनिक वाहन चल सकते हैं। उसने तिब्बत में स्थल सेना की छावनी और वायुसेना के अड्डे स्थापित कर लिए हैं और भारतीय सीमा पर उसका दबाव बढ़ता जा रहा है। उसकी इस बढ़ती हुई उपस्थिति के कारण हमारे सेना प्रमुख को कहना पड़ा है कि अब हमें पाकिस्तान से लगती सीमा से भी अधिक चीन से लगती सीमा पर ध्यान देना होगा। मोदी सरकार ने पहली बार समझदारी दिखाते हुए उत्तर और पूर्व के सीमावर्ती क्षेत्रों में सामरिक तंत्र विकसित करने का निर्णय लिया है। आम तिब्बती जानते हैं कि चीन की सामरिक शक्ति को देखते हुए वे हिंसक संघर्ष के द्वारा उससे अपनी स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सकते।


चीनी शासक निरंतर तिब्बत के जनभूगोल को बदलने की कोशिश करते रहे हैं। लेकिन तिब्बत की कठिन जलवायु और रहन-सहन की असुविधाजनक परिस्थितियों को देखते हुए यह आसान काम नहीं है। चीनी और तिब्बतियों के बीच कोई सामाजिक और सांस्कृतिक समानता नहीं है। ऐतिहासिक रूप से चीन अपने सभी पड़ोसियों पर अपना बौद्धिक और सांस्कृतिक प्रभाव डालता रहा था। कोरिया, जापान और वियतनाम सब पर कन्फ्यूशियस की मान्यताओं का असर रहा था और वे चीन से अनेक तरह के राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव ग्रहण करते रहे थे। लेकिन तिब्बत पर चीन का कभी कोई प्रभाव नहीं रहा। तिब्बत सांस्कृतिक रूप से सदा भारत के अधिक निकट रहा है।


सदा अपनी सीमाओं में और अंतर्मुख रहे चीन ने 1950 के बाद यूरोपीयों की देखादेखी अपना भौगोलिक विस्तार करना शुरू किया था। उसने रूस से समझौता करके मंगोल और मांचू इलाकों पर नियंत्रण किया। इसके अलावा उसने शिंजियांग और तिब्बत के विशाल क्षेत्र को अपनी सीमा में मिला लिया। इस समय चीन का 55 प्रतिशत भाग वह है, जहां उसने 1950 के बाद अपना औपनिवेशिक विस्तार किया। अगर इतिहास से सबक लिया जाए, तो उपनिवेश कालांतर में अपनी शक्ति और साधनों पर बोझ ही साबित होते हैं। यूरोपीय इसीलिए अपने विशाल उपनिवेशों से हाथ खींचकर अपनी सीमा में लौट गए। आज यूरोप के बाहर वे वहीं हैं, जहां मूल आबादी को उन्होंने पूरी तरह समाप्त कर दिया था। रूस ने 16वीं शताब्दी में साइबेरिया में अपना विस्तार किया था और वह आज भी उसके नियंत्रण में है। पर वह निर्जन क्षेत्र है। तिब्बत का चीन अभी भौगोलिक कायाकल्प करने में लगा है। लेकिन आर्थिक सामर्थ्य बढ़ने पर तिब्बतियों का राजनीतिक सामर्थ्य भी बढ़ेगा और उन पर राज करते रहना चीनियों के लिए बोझ होता जाएगा। एक स्वतंत्र जाति और देश के रूप में तिब्बत का भविष्य सुनिश्चित है।

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