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सिपरी रिपोर्ट: महाशक्तियों के बीच हथियारों की सीमा संबंधी सभी वार्ताएं खत्म, परमाणु युद्ध की जमीन तैयार है

प्रशांत दीक्षित
Updated Wed, 17 Jul 2024 03:09 AM IST

सार

रूस के पास दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु हथियार भंडार है और हमें भरोसा दिलाया जाता है कि जंगी परमाणु उपकरण का कोई रणनीतिक मतलब नहीं होता! हालांकि, अध्ययनों से पता चला है कि आधुनिक जंगी हथियार अब भी 1945 में नागासाकी और हिरोशिमा पर गिराए गए हथियारों की तुलना में काफी अधिक ऊर्जा जारी कर सकते हैं।
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परमाणु युद्ध की कगार पर दुनिया (प्रतीकात्मक) - फोटो : एएनआई


इस परिदृश्य को रॉयटर्स की एक रिपोर्ट और भयावह बनाती है, जिसमें बताया गया है कि 'रूस सैन्य अभ्यास करेगा, जिसमें जंगी परमाणु हथियारों के उपयोग का अभ्यास किया जाएगा। यह 6 मई, 2024 तक की ताजा रिपोर्ट है। सैन्य अभ्यास में गैर-रणनीतिक परमाणु हथियारों के उपयोग के लिए तैयारी और तैनाती का अभ्यास इसमें शामिल होगा। रूस के दक्षिणी सैन्य जिले में मिसाइल संरचनाएं होंगी और नौसेना बल इसमें भाग लेंगे।


अभ्यास के दौरान, 'तथाकथित' गैर-रणनीतिक परमाणु हथियारों की तैयारी और उपयोग के कई उपाय किए जाएंगे। यह जंगी परमाणु हथियारों के लिए एक गलत नाम है। रूस का दावा है कि अभ्यास का उद्देश्य 'रूसी संघ के खिलाफ कुछ पश्चिमी अधिकारियों द्वारा दिए गए भड़काऊ बयानों और धमकियों के जवाब में' रूस की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता सुनिश्चित करना है। रूसी सेना की लीक हुई फाइलों के अनुसार, व्लादिमीर पुतिन की सेनाओं ने एक प्रमुख विश्वशक्ति के साथ संघर्ष के शुरुआती चरण में जंगी परमाणु हथियारों का उपयोग करने का अभ्यास किया है, जिसमें चीन द्वारा आक्रमण के लिए प्रशिक्षण भी शामिल हैं। रूस अपने परमाणु शस्त्रागार को अपनी रक्षा नीति की आधारशिला मानता है और कुछ युद्धक्षेत्र में पहले परमाणु हमला करने के लिए यह अपने बलों को प्रशिक्षित करता है।


सैन्य अभ्यासों से पता चलता है कि ‘यदि पारंपरिक तरीकों से वांछित परिणाम प्राप्त नहीं किया जा सकता है, तो परमाणु हथियारों का उपयोग करने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।’ रूस के जंगी परमाणु हथियार, जिन्हें जमीन या समुद्र से प्रक्षेपित मिसाइलों या विमानों से पहुंचाया जा सकता है, यूरोप और एशिया में सीमित युद्धक्षेत्र में उपयोग के लिए तैयार किए गए हैं, जबकि बड़े 'रणनीतिक' हथियारों का उद्देश्य अमेरिका पर हमला करना है।


रूस के पास दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु हथियार भंडार है और हमें भरोसा दिलाया जाता है कि जंगी परमाणु उपकरण का कोई रणनीतिक मतलब नहीं होता! हालांकि, अध्ययनों से पता चला है कि आधुनिक जंगी हथियार अब भी 1945 में नागासाकी और हिरोशिमा पर गिराए गए हथियारों की तुलना में काफी अधिक ऊर्जा जारी कर सकते हैं। रूस ने इसी वर्ष जून में उत्तर कोरिया के साथ एक पारस्परिक हथियार आपूर्ति संधि पर भी हस्ताक्षर किए, जिसका मुख्य उद्देश्य अपने शस्त्रागार को बढ़ाना और जंगी परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम बैलिस्टिक मिसाइलों का भंडार भरना है।


अमेरिका भी मानो इस होड़ में पीछे नहीं रहना चाहता। अप्रैल 2023 में, अमेरिकी स्ट्रेटेजिक कमांड ने ग्लोबल थंडर नामक सैन्य अभ्यास शुरू किया था, जिसमें देश की परमाणु कमान, नियंत्रण और संचालन प्रक्रियाओं का सफलतापूर्वक परीक्षण व सत्यापन किया गया। इसकी योजना एक साल पहले से ही बनाई जा रही थी। यह 'रणनीतिक कमान के जवानों और इकाइयों को मित्र राष्ट्रों और साझेदार संगठनों के साथ प्रशिक्षण के लिए तैयार करता है, ताकि एकजुटता मजबूत की जा सके और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए जरूरी अमेरिका के रणनीतिक निवारक बल की तत्परता, प्रभावशीलता और सुरक्षा को बढ़ाया जा सके।'


नाटो सहयोगियों ने भी अपनी गति बनाए रखी है और उसने 24 जनवरी, 2024 को दशक का अपना सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू किया, जिसमें 90,000 जवानों को उत्तरी अटलांटिक और यूरोप में महीनों तक चलने वाले युद्धाभ्यास में भाग लेने के लिए तैयार किया गया। अभ्यास मुख्य रूप से पोलैंड और नॉर्वे में हो रहे हैं, लेकिन जर्मनी, बाल्टिक राज्यों, रोमानिया, फिनलैंड, स्लोवाकिया, ग्रीस और स्वीडन में भी हो रहे हैं। दावा किया गया कि यह अभ्यास यूक्रेन में रूस के 'विशेष सैन्य अभियान' और व्लादिमीर पुतिन द्वारा यूरोप के पूर्वी देशों को दी गई धमकियों पर प्रतिक्रिया देने की गठबंधन की क्षमता का परीक्षण करेगा। इस तरह से परमाणु टकराव की स्थिति पूरी तरह से तैयार है। इसमें चीन भी पीछे नहीं रहना चाहता, इसलिए उसने अपने शस्त्रागार में 90 और परमाणु हथियार जोड़ लिए हैं और उन्हें हाई अलर्ट पर रखा है।
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परमाणु हथियारों में इस वृद्धि के कारण स्पष्ट रूप से हैरान करने वाले हैं। दावा किया जाता है कि 11 मार्च, 2024 को अग्नि पांच पर भारत द्वारा मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल्स (एमआईआरवी) का परीक्षण चीनी कार्रवाई को बढ़ावा दे सकता है। हालांकि भारतीय अनुसंधान प्रतिष्ठान केवल अमेरिका, फ्रांस, रूस, चीन और ब्रिटेन के उस चुनिंदा समूह में शामिल होना चाहता है, जिनके पास यह क्षमता है। रणनीतिक मजबूरियों की वजह से शायद भारत भी पीछे नहीं रहना चाहता! ऐसे में, हम इस धारणा से बच नहीं सकते कि हम एक अत्यंत प्रतिकूल शीतयुद्ध परमाणु परिदृश्य का सामना कर रहे हैं, जबकि ध्यान देने वाली बात है कि महाशक्तियों के बीच हथियारों की सीमा संबंधी सभी वार्ताएं खत्म हो गई हैं।

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