रामलाल काफी समय से यह जानने के लिए मेरे पीछे पड़ा है कि बनाना रिपब्लिक और मैंगो पीपल क्या बला है। एक बार जब उसने जिद ठान ली, तो वह मानकर ही रहेगा। बिहार में मास्टरों की पात्रता परीक्षा की बुरी खबर के कारण मेरी हालत पहले से ही खराब है।
भला यह कोई बात हुई कि कैलकुलेटर और कंप्यूटर के दौर में मास्टर गिनती, पहाड़े खुद रटें और बच्चों को भी रटाएं। एक से एक नई शब्दावली आ रही है। सब कुछ जानने का ठेका मास्टरों ने ही ले रखा है क्या? भूगोल के मास्टरों को अपने देश के बारे में ही नहीं मालूम, विदेश की कौन बात करे! भैया, गूगल बॉय से पूछो या सीधे गूगल दादा का सिर चाटो।
लेकिन रामलाल तो बस रामलाल है। बनाना रिपब्लिक और मैंगो पीपल के बारे में जाने बगैर वह हिलने वाला नहीं है। मैंने टरकाया उसे कि देखो, आम फलों का राजा है न। तो बस समझो कि लोकतंत्र में आम आदमी भी राजा है। वह जिसे चाहे सिर पर बैठा ले और जिसे चाहे धूल चटा दे।
रही बात बनाना यानी केले की, तो वह उसकी जगह थोड़े ही ले सकता है। केला तो गरीबों का फल है। शहर में जाकर देखो, कितने गरीब रोज केले खाकर अपना पेट भरते हैं। खराब होने की स्थिति में वह मुफ्त में बांट देने को अभिशप्त है। आम से उसकी क्या तुलना! बड़े-बूढ़े भी घर में केले का पेड़ लगाने को मना करते हैं, क्योंकि केला अकेला रह जाता है।
फिर आम जितने प्यार और ललक से खाया जाता है, केले की उतनी पूछ कहां! उसकी वजह दोनों की आबादी का फर्क भी है। एक गुच्छे में पांच-दस आम ही होते हैं, जबकि एक पेड़ पर केला गरीब के कुनबे की तरह फैला हुआ रहता है। इतना कि हम गिन भी नहीं सकते। इसलिए उसकी पूछ कम है।
लेकिन रामलाल कोई कम खिलाड़ी थोड़े ही है। वह जानता है कि मैंगो पीपल का मतलब भी गरीब आबादी से है। जब मैंगो गरीब नहीं है, तो मैंगो पीपल गरीब कैसे? वॉड्रा जी ने कभी आम आदमी का मजाक इसी तरह तो उड़ाया था। अब चौंकने की बारी मेरी है। अंग्रेज भी कोई कम खिलाड़ी थोड़े-ही हैं। बनाना रिपब्लिक कहकर वे पिछड़े देशों को निशाना बनाते हैं, और मैंगो पीपल भी हम जैसे लोग ही हैं। अंग्रेज न तो केले में आते हैं, न आम में। बड़े लोग जो ठहरे।
सच कहूं, तो खुद मुझे भी नहीं मालूम कि लड़ाई में कौन जीतेगा-बनाना या मैंगो?