राजग सरकार द्वारा आज 'एक राष्ट्र-एक चुनाव' विषय पर चर्चा करने के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जबसे एक राष्ट्र-एक चुनाव की अवधारणा को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है, तबसे देश भर में इस पर बहस चल रही है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने भी विभिन्न स्तरों पर इस मुद्दे को आगे बढ़ाया है।
इसमें कोई शक नहीं है कि बार-बार चुनाव होने और चुनाव आचार संहिता के लागू होने से सरकार के विकास कार्य ठप पड़ जाते हैं। चाहे कोई इसके पक्ष में हो या विपक्ष में, इसे देख सकता है। तो क्या भारत राष्ट्रपति चुनाव प्रणाली की तरफ आगे बढ़ रहा है? क्या अखिल भारतीय स्तर का आज कोई दूसरा बड़ा राजनीतिक दल है? 135 वर्ष पुरानी पार्टी कांग्रेस लगातार 2014 और 2019 में बुरी तरह चुनाव हार चुकी है। क्या आज भारतीय जनता पार्टी के रूप में सिर्फ एक अखिल भारतीय पार्टी बची है? बेशक क्षेत्रीय दलों का कुकुरमुत्ते की तरह उभार हुआ है, लेकिन अपनी मातृभाषा पर जोर ही उन पर हावी है। प्रधानमंत्री मोदी लगातार विकास की बात करते हैं। लेकिन विकास सुनिश्चित करने के लिए बाधाओं को दूर करना होगा। कुछ राज्यों में बार-बार चुनाव होते हैं, जो विकास कार्यों में बाधा डालते हैं।
भारतीय विधि आयोग ने इस पर विचार-विमर्श किया था। एक राष्ट्र-एक चुनाव की अवधारणा के तहत पांच वर्ष की अवधि पर राज्य विधानसभाओं, लोकसभा और पंचायतों में एकल चुनाव कराने की बात कही गई है। लेकिन एकल चुनाव प्रणाली को अपनाने में हमारे देश की बेहद जटिल और विविध राजनीतिक प्रकृति एक बड़ी चुनौती है। हमारे संविधान की संरचना एक साथ चुनाव को बढ़ावा देती है। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की पहली बैठक की तारीख से पांच साल के कार्यकाल का प्रावधान क्रमशः संविधान के अनुच्छेद 83 (2) और 170 (1) के तहत उल्लिखित है। किसी राज्य की सांविधानिक मशीनरी के विघटन या विफलता की स्थिति में अनुच्छेद 356 एक अपवाद के रूप में लागू किया जाता है।
पिछली बार जब देश में एक साथ चुनाव हुए थे, तब से लेकर अब तक राजनीतिक परिदृश्य में प्रवृत्तियों और जमीनी आधार में बहुत बदलाव हुए हैं। चूंकि संविधान में एक साथ चुनाव के पक्ष में स्पष्ट कुछ नहीं कहा गया है, इसलिए गठबंधन सरकारों के उदय और बहुदलीय प्रणाली ने मौजूदा चुनावी प्रणाली को बढ़ावा दिया।
ऐसे बदलते परिदृश्यों पर चर्चा करने में राजनीतिक दलों की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत को चुनाव सुधारों और राजनीति में अच्छी प्रथाओं की शुरुआत की आवश्यकता है। राजनीतिक दल विभिन्न सुधारों, जैसे- राजनीतिक दलों की आय की पारदर्शिता, सक्रिय राजनीति में विभिन्न जाति समूहों और महिलाओं की भागीदारी, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के उपाय, विभाजनकारी राजनीति से परहेज, आदि के प्रति अनिच्छुक हैं। मतदाता उम्मीदवारों से असंतुष्ट रहते हैं। कई सारे राजनीतिक पार्टी के मैदान में रहने के बावजूद कई मतदाता नोटा का बटन दबाते हैं। वोटिंग प्रतिशत में कमी, चुनावों के दौरान गड़बड़ी की खास लहर और बेबुनियाद राजनीतिक बहस का अंतहीन सिलसिला भी चिंता के विषय हैं। यह राजनीतिक दलों की छवि पर सवाल उठाता है और लोगों के हितों को प्रभावित करता है।
आइए, हम एक राष्ट्र-एक चुनाव के फायदे और नुकसान पर चर्चा करते हैं। कहा जाता है कि संघवाद शासन में प्रभावकारिता को बढ़ावा देता है, चाहे वह राजनीतिक हो या आर्थिक। राष्ट्र की बेहतर स्थिरता और समृद्धि के लिए यह आवश्यक है कि संघीय संरचना बरकरार रहे। एक साथ चुनाव कराने के विरोध में कई तर्क दिए जाते हैं, मसलन-इससे राष्ट्रीय पार्टियों को फायदा होगा, क्षेत्रीय मुद्दों पर राष्ट्रीय मुद्दे हावी हो जाएंगे, संघीय संरचना में गड़बड़ी पैदा होगी, एक साथ चुनाव कराने के लिए कर्मचारियों और सुरक्षा की कमी होगी तथा चेक ऐंड बैलेंस के सिस्टम में गड़बड़ी होगी।
हालांकि विभिन्न समितियों और संस्थानों की रिपोर्टों में एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में तर्क दिए गए हैं, जो बताते हैं कि इससे समय और ऊर्जा की बचत होगी, व्यक्तिवाद पर राष्ट्रवाद को तवज्जो मिलेगी, भ्रष्टाचार और जातिवाद की भूमिका घट जाएगी, आदर्श आचार संहिता लागू करने में सुविधा होगी और वोटिंग प्रतिशत में बढ़ोतरी होगी। विभिन्न राजनीतिक दलों, संगठनों, व्यक्तियों और विशेषज्ञों से परामर्श करने के बाद दिसंबर 2015 में राज्यसभा में 79 वीं रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें विभिन्न सुधारों और आचरणों का सुझाव दिया गया। इसमें यह माना गया कि आपातकाल के अलावा विधानसभाओं का कार्यकाल नहीं बढ़ाया जा सकता, लेकिन लोकसभा, राज्य विधानसभाओं के चुनाव जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 के खंड 14 एवं 15 के तहत छह महीने पहले कराए जा सकते हैं। विधि आयोग ने इस पर सात राष्ट्रीय और 59 क्षेत्रीय/राज्य पार्टियों से उनकी प्रतिक्रिया मांगी थी, लेकिन इस पर सर्वसहमति नहीं बन पाई।
आयोग की सबसे ताजा मसौदा रिपोर्ट विभिन्न राजनीतिक दलों, संगठनों और विशेषज्ञों के एक साथ चुनाव कराने के मुद्दे पर विचार जानने के बाद जारी की गई है। संविधान की संरचना को ध्यान में रखते हुए, मसौदे में संविधान और कानूनों में कम से कम संशोधन का सुझाव दिया गया है।
इसमें संविधान के अनुच्छेद 172 में संशोधन और लोकसभा के साथ राज्य विधानसभाओं के चुनाव कराने के लिए तीन विकल्प सुझाए हैं। एक साथ चुनाव कराने के विचार को नीति आयोग ने भी समर्थन दिया है, जो बार-बार चुनाव को एक मूलभूत समस्या बताता रहा है। प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में एक साथ चुनाव को शामिल किया था। इसके अलावा देश के पूर्व और मौजूदा राष्ट्रपति भी इसका समर्थन करते हैं। कई देशों ने एक राष्ट्र-एक चुनाव की नीति को अपनाया है। लेकिन विभिन्न देशों की जलवायु और आर्थिक स्थितियां अलग-अलग हैं।
यह सच है कि मौजूदा समय में एक साथ चुनाव कराने का विचार संघवाद के लिए खतरे के रूप में दिखता है। लेकन हमें अपनी व्यवस्था में जरूरी सुधारों से नहीं कतराना चाहिए। उपर्युक्त रिपोर्ट में एक साथ चुनाव कराने के विभिन्न मॉडलों को सुझाया गया है। देश में एक साथ चुनाव कैसे लागू हो सकते हैं, यह समझने के लिए इन पर चर्चा करने की आवश्यकता है।