कहा गया है कि मीठी वाणी बोलने से दूसरों के मन में ही नहीं, खुद के अंदर भी मिठास की अनुभूति होती है। मीठी वाणी बोलने वाले व्यक्ति को कभी अहं जैसे दुर्गुण नहीं घेर सकते और वह स्वतः सरलता और सादगी को जीवन का ध्येय बना लेता है। संत टॉलस्टॉय ऐसे ही सज्जन रहे हैं, जिन्होंने सरलता को अपने साहित्य में भी जगह दी और देश-दुनिया में नामचीन हुए।
एक दिन वह रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर खड़े थे। एक युवती ने उन्हें कुली समझकर कहा, यह लिफाफा सामने के होटल में मेरे पति को दे आओ। इसके लिए मैं तुम्हें दो रूबल दूंगी।
टॉलस्टॉय ने लिफाफा लिया और उसे होटल में दे आए। महिला ने दो रूबल उन्हें थमा दिए और रेल की प्रतीक्षा करने लगी। इसी बीच उस महिला के शिक्षक रहे एक व्यक्ति वहां पहुंचे। उन्होंने संत टॉलस्टॉय को देखते ही श्रद्धापूर्वक उनका अभिवादन किया और बोले, आपके पावन दर्शन कर मैं कृतकृत्य हो उठा हूं।
महिला को समझते देर नहीं लगी कि जिन्हें वह कुली समझ रही थी, वह कोई बड़ी विभूति हैं। उसने शिक्षक से पूछा, यह साहब कौन हैं? शिक्षक ने जैसे ही संत टॉलस्टॉय का नाम लिया, महिला को पसीना आ गया। टॉलस्टॉय बोले, मैडम, मैं आपके दिए दो रूबल लौटाने वाला नहीं हूं। यह मेरे परिश्रम की कमाई है। महिला एक महान संत की सरलता-सादगी के समक्ष नतमस्तक हो उठी।