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खामोशी-रोजगार की टक्कर: बिहार की सियासत में मौन बनाम तेजस्वी प्रण; NDA के संकल्प पत्र में CM नीतीश की चुप्पी..

राजकिशोर
Updated Sat, 01 Nov 2025 05:38 AM IST

सार

बिहार में चुनावी घोषणापत्र जारी होने के बाद अब राज्य की सियासत में मौन बनाम तेजस्वी प्रण का जिक्र होने लगा है। एनडीए का संकल्प पत्र जारी होते समय सीएम नीतीश कुमार की चुप्पी से महागठबंधन को नया गोला-बारूद मिल गया। पढ़िए ये रिपोर्ट
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नीतीश कुमार, पीएम मोदी, तेजस्वी यादव। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स


एनडीए के संकल्प पत्र जारी करने के मंच पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चुप्पी ने बिहार की राजनीति में नई गर्माहट ला दी है। मंच पर सिर्फ किताब दिखाते हुए खड़े रहना और कुछ न कहना, यह विपक्ष के लिए बड़ा हथियार बन गई। महागठबंधन ने इसे तुरन्त राजनीतिक संदेश में बदला कि नीतीश बोल नहीं पा रहे, भाजपा उन्हें बोलने नहीं देती। तेजस्वी यादव, मुकेश सहनी से लेकर अशोक गहलोत तक इस मुद्दे पर हमलावर हो गए। तेजस्वी ने हमला बोला कि जो नेता बोल नहीं सकता, वो बिहार कैसे चलाएगा? सहनी ने तंज कसा नीतीश की आवाज दिल्ली में बंद कर दी गई है।


सियासी तस्वीर का दूसरा हिस्सा खो गया कि नीतीश सिर्फ मंच पर मौन थे, चुनावी मैदान में नहीं। चुनावी सभाओं में वे लगातार बोल रहे हैं, विपक्ष पर करारे हमले कर रहे हैं और महागठबंधन की नौकरी बनाम रोजगार राजनीति पर सीधा प्रहार कर रहे हैं। यानी मौन स्थायी तो नहीं है। एनडीए के नेता इसे रणनीतिक और सांकेतिक बताने में जुटे हैं, लेकिन नीतीश मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाएंगे के नैरेटिव को पीएम मोदी और अमित शाह ने ध्वस्त करने की कोशिश की तो महागठबंधन ने मौन पर मुखरता धारण कर ली।


चर्चा में मौन की तस्वीर...विपक्ष के निशाने पर; एनडीए का पलटवा

भाजपा को समझ आ गया कि चुनाव में विकास का रिकॉर्ड दिखाने से पहले नेतृत्व की विश्वसनीयता को बचाना आवश्यक है। नीतीश के मौन से उपजे संकट की काट के लिए, पार्टी के शीर्ष नेता मैदान में उतरे। पीएम नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच से नीतीश के अगले मुख्यमंत्री बनने की घोषणा की, जिसे अमित शाह ने भी दोहराया। यह सीएम चेहरा संदिग्ध वाले नैरेटिव पर सीधा और निर्णायक वार था।

  • रोजगार के मामले में, भाजपा ने सरकारी नौकरी बनाम कुल रोजगार की बहस छेड़ी। एनडीए स्टार्टअप, उद्योग और निजी निवेश के माध्यम से रोजगार का एक व्यापक मॉडल प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है, यह तर्क देते हुए कि केवल सरकारी नौकरियां देना अव्यावहारिक है।

नीतीश कुमार की असामान्य चुप्पी ने चुनावी माहौल में तीव्र और असहज गूंज पैदा कर दी


एनडीए के संकल्प पत्र जारी करने के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की असामान्य चुप्पी ने चुनावी माहौल में तीव्र और असहज गूंज पैदा कर दी है। मंच पर उनकी खामोशी और सिर्फ पुस्तिका दिखाने की मुद्रा ने विपक्ष को बहुप्रतीक्षित गोला-बारूद दे दिया। महागठबंधन ने इस मौन को तुरंत सियासी मजबूरी और भाजपा की नियंत्रण राजनीति के रूप में पेश किया। सवाल दागा कि बिहार को रिमोट सीएम चाहिए या जमीन से निकला नेता।

  • तेजस्वी और सहनी के साथ ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने व्यंग्य किया कि जो खामोश है, वही मजबूर सत्ता का साथी है। इसके साथ ही, महागठबंधन ने भावनात्मक अस्मिता का तीर चलाया। छठ मइया का अपमान, बाहरी का सम्मान...घरवालों का अपमान जैसे नारे सीधे तौर पर स्थानीय स्वाभिमान के पिच को मजबूत करते हैं, जिसका सीधा निशाना नीतीश के नेतृत्व पर है।
  • महागठबंधन का पूरा प्रयास इस बात पर केंद्रित है कि नीतीश पहले वाले मजबूत नेता नहीं रहे, और उन्हें किनारे किया जा रहा है।

तेजस्वी का रोजगार मंत्र


तेजस्वी ने चुनाव को नौकरी बनाम सुशासन की पुरानी बहस से निकालर सम्मान बनाम मजबूरी में बदलने की कोशिश की है। हर घर से सरकारी नौकरी का वादा बिहार की सबसे बड़ी पीड़ा, पलायन और बेरोजगारी को संबोधित करता भावनात्मक लक्ष्य है। यही कारण है कि एनडीए को भी अपनी चुनावी पिच बदलनी पड़ी और एक करोड़ सरकारी और निजी नौकरियों का वादा कर इसका काट निकालने की कोशिश की। 


खामोशी का संदेश और सियासी मनोविज्ञान

बिहार में यह चुनाव सिर्फ आंकड़े बनाम वादों का ही नहीं, राजनीतिक मनोविज्ञान का भी है। तेजस्वी की आक्रामक शैली और युवा-आधारित कैम्पेन बदलाव की ऊर्जा पैदा करता है, जबकि नीतीश का मौन और मोदी-नीतीश ब्रांड का भरोसा स्थिरता का आश्वासन देता है। राजनीति में खामोशी भी दस्तावेज बन जाती है। इस बार नीतीश की खामोशी विपक्ष का हथियार बन गई है। मतदाता के सामने दो विकल्प हैं-नीतीश का अनुभव और भाजपा की विकास की गारंटी...दूसरी ओर तेजस्वी का नौकरी वादा और बदलाव की मुखर लहर। इस बार की लड़ाई कॅरिअर बनाम नेतृत्व और मौन बनाम मुखरता की है, और नौकरी का भरोसा किस पर...यह अपेक्षा या आकांक्षा पीछे नहीं छूटने वाली।

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