अमेरिका और ईरान के बीच 28 फरवरी को युद्ध छिड़ने के बाद न सिर्फ कच्चे तेल की कीमत बढ़ी, बल्कि आपूर्ति पर भी खासा असर पड़ा, लेकिन सरकार के पूंजीगत खर्च जारी रखने से आर्थिक गतिविधियों को काफी समर्थन मिला। अर्थशास्त्रियों के आकलन (7.1-7.2 फीसदी) को भी पीछे छोड़ते ये आंकड़े दर्शाते हैं कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद, देश की आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। इससे साफ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में किसी भी रुकावट को धता बताते हुए अपनी रफ्तार बनाए रखने की क्षमता है, जो सरकार की आर्थिक नीतियों की दिशा को सही ठहराती है।
इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में 10 फीसदी विकास दर के साथ सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा। इस दौरान विनिर्माण (9.2 फीसदी) और निर्माण (7.7 फीसदी) ने भी अर्थव्यवस्था को काफी सहारा दिया। तिमाही के अंत में मजबूत औद्योगिक गतिविधियों ने भी कुल विकास को समर्थन दिया। इससे भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था का महत्व भी उजागर होता है। अपेक्षाकृत बड़े घरेलू उपभोक्ता बाजार ने वैश्विक मांग और व्यापार में कुछ कमजोरी से अर्थव्यवस्था को बचाने में मदद की है।
बेशक कठिन वैश्विक हालात में 7.8 फीसदी की विकास दर हासिल करना निश्चित रूप से उत्साहजनक और बड़ी कामयाबी है, लेकिन इससे भविष्य के जोखिम कम नहीं हो जाते। तेल की कीमत अब भी एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है, क्योंकि भारत अपने कच्चे तेल की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऊर्जा की कीमत में लगातार बढ़ोतरी से परिवहन की लागत बढ़ जाती है और महंगाई पर दबाव बढ़ जाता है।
हाल के दिनों में विभिन्न खाद्य पदार्थों की कीमतों में उछाल देखने को मिला ही है। इसके अलावा, देश में मानसून की बारिश एक समान नहीं रही है, जिसका असर फसल उत्पादन पर पड़ेगा। विकास दर के ये आंकड़े अर्थव्यवस्था को ठोस आधार देते हैं, लेकिन आगे मजबूत निजी निवेश, उपभोग और निर्यात के जरिये इस रफ्तार को बनाए रखना होगा, ताकि बाहरी दबाव विकास पर भारी न पड़े।