इस देश में अनेक अवतारी पुरुष हुए, लेकिन भगवान कृष्ण उन सबमें अद्वितीय हैं, सर्वाधिक आकर्षक हैं। उनके नाम का भी मूलतः यही अर्थ है। कृष्ण अर्थात जिसमें आकर्षण है- सबको अपनी ओर आकृष्ट करने वाला। इसका गहरा अर्थ यह है कि कृष्ण में अस्तित्व के सभी रूप, सभी कलाएं, सभी आयाम, सभी पहलू एक साथ विद्यमान हैं। वह समग्र अस्तित्व को रूपायित करते हैं। वह मनुष्य रूप में होते हुए भी विराट की झलक देते हैं। कृष्ण सर्वथा मौलिक हैं। उनके पहले परमात्मा के जो भी अवतार हुए, कृष्ण पहले हुए किसी भी अवतार को दोहराते नहीं हैं। वह जीवन के किसी एक आयाम को नहीं चुनते, बल्कि सभी आयामों को समग्र स्वीकार करते हैं। इसलिए एक आध्यात्मिक व्यक्ति के संबंध में हम जो भी धारणाएं बनाते हैं कि वह चोरी नहीं करेगा, नीतिवान होगा, स्त्री की ओर नहीं देखेगा, लड़ाई नहीं करेगा- भगवान कृष्ण इन धारणाओं की सभी सीमाओं से पार हैं। यही उनकी मौलिकता है।
श्रीमद्भागवत में वस्त्र-हरण लीला में कृष्ण का नैसर्गिक रूप नीतिवादियों के लिए आपत्तिजनक हो सकता है। मगर ओशो कहते हैं, कृष्ण के जीवन में काम-ऊर्जा की निश्छल स्वीकृति है, सहज स्वभाव का अंगीकार है। इसलिए कृष्ण की घटनाओं को जो लोग अलग रूप देने की कोशिश करते हैं, तो मैं मानता हूं कि काम ऊर्जा की जो सहजतम अभिव्यक्ति हो सकती है, वह कृष्ण में हुई है। फिर इस घटना के कुछ वर्षों के बाद जब दुर्योधन द्रोपदी के वस्त्र हटाने की आज्ञा देता है, तो कृष्ण द्रोपदी को वस्त्रों से ढकते हैं। गोपिकाओं के वस्त्र चुराना और द्रोपदी को वस्त्रों से ढकना- इन दोनों घटनाओं में कृष्ण का प्रेम है।
जीवन की सभी परिस्थितियों में अचल खड़े रहने वाले कृष्ण एक सिद्ध योगी हैं। कैसी भी विषम परिस्थितियां हों, कृष्ण अपनी सम-अवस्था में अविचल हैं, स्थित-प्रज्ञ हैं। इसलिए उन्हें योगीराज कहा जाता है। योगीराज का अर्थ है, अपने केंद्र से संयुक्त बने रहना, अस्तित्व के साथ अद्वैत बने रहना। पृथक हो गया व्यक्ति तो टूट जाता है। योग को उपलब्ध व्यक्ति अटूट और अखंड होता है। उसमें परमात्मा परिलक्षित होता है। इसलिए कृष्ण जैसा योगेंद्र ही अर्जुन को कह सकता है, सर्वधर्मान परित्यज्य, मामेकं शरणं ब्रज। छोड़ो सब धर्मों को और मेरी शरण में आओ। इस वक्तव्य में कृष्ण के माध्यम से परमात्मा ही बोल रहा है।
कृष्ण का एक और सूत्र, जो मुझे प्रिय है, वह है, योगाः कर्मसु कौशलम्। कर्म में कुशलता ही योग है। कृष्ण के पहले और बाद में भी धर्म ने त्याग, पलायन और भगोड़ेपन को प्रोत्साहन दिया और धर्म के इस रूप ने जीवन को कुरूप कर दिया। जीवन का एक असहज बंटवारा हो गया-संसार और अध्यात्म में। इससे कोई संस्कृति तो पैदा न हुई, जीवन विकृत हो गया। तथाकथित साधु-संत भिखारी का दीन-हीन जीवन जीने लगे, उन्होंने आत्मपीड़न किया और समाज को प्रगति या उन्नति की ओर न ले जा सके। भारत की गरीबी और दुर्दशा में उनका पूरा हाथ है। अगर उन्होंने कृष्ण की शिक्षाओं को आत्मसात किया होता, तो हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति स्वर्ण-शिखरों पर विद्यमान होती। यह अब भी हो सकता है। अगर हम कृष्ण की जीवन विधायक दृष्टि को आत्मसात करें, उसे आनंद से जिएं, उसका समग्र स्वीकार करें, तो हमारा बहुमुखी विकास हो सकता है। हमारे जीवन में आनंद के फूल खिल सकते हैं।