हिंदी पाठयक्रम को सामाजिक अनुभवों की विविधता से संपन्न करने की शुरुआत कब से हुई? यह स्वेच्छा से हुई या विवशता में? सामाजिक लोकतंत्र के निर्माण की आवश्यकता के मद्देनजर दलित और कतिपय गैरदलित साहित्यविदों में पाठ्यक्रम की जड़ता को मिल-जुलकर तोड़ने की लोकतांत्रिक आवश्यकता पर साहित्यिक और अकादमिक सहमति कैसे बनती चली गई?
एक समय ऐसा भी आया था, जब हिंदी में दाखिले बंद होने लगे थे और अव्यावसायिक ज्ञान गैरजरूरी साबित होने लगा था। हिंदी के पुरातनपंथियों की जिद थी कि ज्ञान के किसी भी क्षेत्र में सुधार हो, किसी भी विषय का पाठयक्रम आधुनिक बने, लेकिन हिंदी में हम न सामाजिक यथार्थ से अपने छात्रों को रूबरू होने देंगे, न जातिगत वर्चस्व और एकाधिकार की स्थिति को सर्वाधिकार में बदलने देंगे। दलित साहित्य के अपढ़ विरोधियों का प्रश्न है कि ऐसा क्या है दलित साहित्य में।
हमारा प्रतिप्रश्न है कि साहित्य में क्या होना चाहिए। क्या उसमें मानवीय संवेदना नहीं होनी चाहिए? क्या नैतिक मूल्यों का संरक्षण और मानव सेवा की भावना नहीं होनी चाहिए? धार्मिक, सांस्कृतिक अनुभव, संपदा का विभिन्न जातियों में आदान-प्रदान नहीं होना चाहिए? हिंसा, क्रूरता, बाल मजदूरी, बंधुआ प्रथा, बेगार बलात्कार, सनातन शोषण, घृणा और वैमनस्य के शिकार कौन लेखक हुए हैं? क्या समाज में घटित होने वाले चित्र साहित्य रूपी सलिल में प्रतिबिंबित नहीं होने चाहिए? हाशिये पर रखे गए या समाज में कम दर्जे के बना कर रखे गए लोग कौन हैं, कैसे हैं? समता, सहयोग, स्वतंत्रता, बंधुता, समभाव, इंसानी भाईचारा किस साहित्य का उद्देश्य है?
ऐसा नहीं है कि दलित साहित्य से हिंदी का पाठ्यक्रम कमजोर हो जाएगा। दलित साहित्य में दलित, पिछड़ी-अगड़ी सवर्ण-अवर्ण तमाम जातियां प्रामाणिक भूमिका में हैं। अपने पात्रों के रूप में। दलित साहित्य का रंग अलग है। हिंदी के प्रतिनिधि दलित साहित्य में न तो गाली-गलौज है, न अश्लीलता। उसमें संघर्ष है, सामाजिक समस्याएं हैं, वेदना है और रचनात्मक विद्रोह की वैचारिक अकुलाहट है।
मराठी में दलित साहित्य 1962 से ही पाठ्यक्रम में शामिल है। कई विश्वविद्यालयों में तो दलित साहित्य अध्ययन और शोधपीठ स्थापित किए जा चुके हैं। वर्ष 2000 में शुरू होने के बाद दलित साहित्य अब उत्तर प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में कहीं वैकल्पिक विषय के रूप में, तो कहीं मुख्य विषय के तौर पर पाठ्यक्रम में शामिल है। लेकिन इसके अध्यापन के प्रति वह उत्साह नहीं है।
इसकी वजहें हैं। नए पाठ्यक्रम में शिक्षकों को पढ़ाने के लिए पढ़ना पड़ता है। युगों-युगों से स्थायी और एकरसता में कुंजीगुरुओं के सहारे बच्चे शॉर्टकट हिंदी में मास्टर और स्नातक होते रहते हैं, लेकिन अपने समय की साहित्यिक विविधता की जानकारी से रिक्त रहते हैं। दलित साहित्य के अध्ययन में भी यह बाधा दिखती है। जो आदमी किन्हीं जातियों के साहित्य को लेकर पूर्वाग्रह रखता हो, उसमें निष्पक्षता, तटस्थता और लोकतांत्रिक विविधता की समझ और स्वीकार्यता न हो, तो वह किसी भी मामले का फैसला पहले ही तैयार रखता है। वह दलित साहित्य के खिलाफ ऐसे-ऐसे तर्क रख देता है कि दंग रह जाना पड़ता है।
जिस उत्तर प्रदेश ने सर्वाधिक दलित लेखक और स्त्री विमर्श की बहुमूल्य कृतियां दी हैं, उसी राज्य में दलित साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के प्रति यह अरुचि हैरान करती है। साहित्य को राजनीति से दूर रखना चाहिए। लेकिन हिंदी पट्टी के विश्वविद्यालयों में लंबे समय से जो सवर्णवादी मानसिकता हावी है, उसे देखते हुए दलित साहित्य का विस्तार और उसका अध्यापन इतना आसान काम नहीं है।
यह स्थिति तब है, जब राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दलित विमर्श जोर पकड़ चुका है। केंद्र सरकार को सलाहें दी जा रही हैं कि दलित उत्पीड़न, बच्चों और बुजुर्गों का शोषण समाप्त करने के लिए अस्पृश्यता और बलात्कारों पर रोक लगाने के लिए कल्याण मंत्रालय और कानून निर्माता दलित साहित्य और स्त्री साहित्य का सहारा लें। लेकिन इससे क्या उत्तर प्रदेश में स्थिति बदलेगी, ऐसा फिलहाल लगता नहीं है।