अरुण नामक एक पराक्रमी दैत्य था। उसके मन में देवताओं को जीतने की धुन सवार हुई। उसने ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया। उसकी कठोर तपस्या से देवलोक हिल उठा। घबराए हुए देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उनसे रक्षा करने की प्रार्थना की। ब्रह्मा जी हिमालय पर पहुंचे और दैत्य से वर मांगने को कहा। उसने कहा कि मुझे अमरत्व प्रदान किया जाए।
ब्रह्मा जी बोले, वत्स, संसार में जन्म लेने वाला मृत्यु को अवश्य प्राप्त होगा। दूसरा वर मांगो। यह सुनकर अरुण ने कहा, वर दें कि मैं न तो युद्ध में मरूं, न ही किसी अस्त्र-शस्त्र से और न ही किसी स्त्री-पुरुष के हाथों। ब्रह्मा जी 'तथास्तु' कहकर अंतर्धान हो गए।
अब दैत्य का अहंकार पराकाष्ठा पर पहुंच गया। उसने आसुरी सेना इकट्ठा की और देवलोक पर चढ़ाई कर उसे अपने अधिकार में ले लिया। देवता भागकर भगवान शंकर की शरण में पहुंचे। भगवान शिव ने कहा, भगवती भुवनेश्वरी की उपासना करो।
देवताओं ने भगवती भुवनेश्वरी की उपासना आरंभ कर दी। उपासना से प्रसन्न होकर आदिशक्ति जगन्माता प्रकट हुईं। उन्होंने कहा, आप सभी निश्चिंत हो जाएं। मैं उस दैत्य का संहार भ्रमरों (विषैले कीटों) से करूंगी। और देखते ही देखते भ्रमरों के समूह ने अपने विषैले डंक से अरुण का नाश कर दिया।