कुरु प्रदेश का राजकुमार भगवान श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त था। सांसारिक सुखों से विरक्ति होते ही राज्य त्यागकर वह वृंदावन जा पहुंचा और वहां श्रीकृष्ण की उपासना करने लगा। एक बार मगध देश के राजा तीर्थयात्रा करते हुए वृंदावन पहुंचे। वटवृक्ष के नीचे तेजस्वी युवक को समाधि में लीन देखकर वह प्रभावित हो उठे। घंटों बाद जब उस युवक की समाधि टूटी, तो राजा ने उससे बात की। उन्होंने कहा, तुम्हारे चेहरे का तेज और भावों को देखकर लगता है कि तुम साधारण परिवार से नहीं, किसी राज परिवार से हो।
युवक ने कहा, राजन, भगवान की लीलाभूमि में न तो कोई राजकुमार होता है और न राजा। मैं तो श्रीकृष्ण के सखा ग्वाल-बालों के चरणों की धूल के बराबर भी नहीं हूं। राजा की कोई संतान नहीं थी। उसने आग्रह किया, तुम हमारे साथ मगध चलो। यहां अभाव का जीवन बिताने से गृहस्थ का जीवन ज्यादा श्रेष्ठ है।
युवक ने पूछा, राजन, क्या गृहस्थ व्यक्ति को दुख नहीं भोगना पड़ता? क्या वह हमेशा सुखी रहता है? राजा ने जवाब दिया, ऐसा तो नहीं है। प्रारब्ध के अनुसार दुख भोगना ही पड़ता है। यह सुनकर युवक ने कहा, राजन, मैं सांसारिक सुख-सुविधाओं से ऊबकर ही भक्ति करने यहां आया हूं। मुझे कृष्ण भक्ति में अनन्य सुख की अनुभूति हो रही है। कृपया मुझे इस अनूठे आनंद से वंचित करने का प्रयास न करें।
राजा उनके चरणों में नतमस्तक होकर लौट गया।