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एक वापसी, कई सवाल: क्या बांग्लादेश की राजनीति में फिर शुरू होगा नया संघर्ष?

महेंद्र वेद
Updated Fri, 07 Aug 2026 06:36 AM IST

सार

दिल्ली से ऑडियो संदेश जारी कर दिसंबर में अपनी स्वदेश वापसी की घोषणा के साथ शेख हसीना ने साफ कर दिया कि वह कानूनी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हैं। ढाका के विरोधी सुरों के बीच, भारत के लिए चुनौती यह है कि वह हसीना के प्रति अपने ऐतिहासिक जुड़ाव को बनाए रखते हुए बांग्लादेश के साथ कैसे तालमेल बिठाता है।
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शेख हसीना - फोटो : एएनआई (फाइल)


शायद इसी वजह से या किसी रणनीति के तहत, उन्होंने अपनी सार्वजनिक बातचीत केवल ऑडियो के माध्यम से की, वीडियो का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने लगभग 30 मिनट तक अंग्रेजी में लिखित बयान पढ़ा, ताकि नई दिल्ली स्थित फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया में मौजूद विदेशी मीडिया तक अपनी बात पहुंचा सकें। उनकी जल्द होने वाली ‘घर वापसी’ से जुड़े इस राजनीतिक और भावुक कार्यक्रम का एक अहम हिस्सा अमेरिका में रहने वाले उनके बेटे साजीब वाजेद जॉय का वीडियो संदेश भी था। उन्होंने उन सवालों के जवाब दिए, जिनका जवाब शायद शेख हसीना खुद नहीं देना चाहती थीं। दोनों ने भारत का शुक्रिया अदा किया। जैसी कि अपेक्षा थी, ढाका ने इस घटनाक्रम पर नाराजगी जताई है, जबकि नई दिल्ली ने साफ कहा कि वह ऐसे किसी ‘निजी’ कार्यक्रम का समर्थन नहीं करता। अब देखना दिलचस्प होगा कि दोनों पड़ोसी देश प्रधानमंत्री तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा और द्विपक्षीय संबंधों (जो पहले से ही तनावपूर्ण है और जिसे सुधारने की जरूरत है) को किस तरह संभालते हैं।


हसीना ने पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने पुराने निर्वासन और वतन वापसी को याद किया। उनका पहला छह साल का निर्वासन दिल्ली में 1975 में शुरू हुआ था, जब उनके पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की हत्या कर दी गई थी। मौजूदा निर्वासन के भी इस हफ्ते पांच अगस्त को दो साल पूरे हो गए। इस दौरान उन्होंने विरासत में मिले उस धर्मनिरपेक्ष सपने और राजनीतिक ढांचे के नष्ट किए जाने का विरोध किया, जिसे उन्होंने मजबूत किया था। अब यह तो समय ही बताएगा कि वह इनमें से कुछ भी फिर से बहाल करेंगी या नहीं। हसीना ने बांग्लादेश में पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई की ‘वापसी’ को लेकर चेतावनी दी। साथ ही, उन्होंने इस्लामी चरमपंथियों और अल-कायदा के बढ़ते प्रभाव की ओर भी इशारा करते हुए कहा कि दुनिया को इस बारे में चिंता करनी चाहिए। लेकिन, दुनिया को इस्लामी चरमपंथ के बढ़ते असर और उससे भारत की सुरक्षा पर पड़ने वाले खतरे को लेकर कोई खास चिंता नहीं है।  


मजबूती से अपना बचाव करने के बावजूद, हसीना को भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और बांग्लादेश की ‘विजेता ही हकदार’ वाली हिंसक राजनीतिक व्यवस्था में अपनी भूमिका को लेकर कुछ सवालों के जवाब देने ही पड़ेंगे। वह अपनी प्रतिद्वंद्वी बेगम खालिदा जिया का ही तरीका अपना रही थीं, जिन्होंने भी यही खेल खेला था। हालांकि, हसीना ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि सत्ता से हटने के बाद हो रही उनकी आलोचना ‘चुनिंदा’ और एक सुनियोजित ‘साजिश’ का हिस्सा है। उनका कहना है कि इसमें इस तथ्य को नजरअंदाज किया गया कि कैसे उन्होंने अपने देश को आर्थिक तरक्की और बेहतर मानव विकास संकेतकों की अभूतपूर्व राह पर आगे बढ़ाया।


उन्होंने अपने आलोचकों, खासकर अपने ‘गैर-कानूनी’ उत्तराधिकारी नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस का नाम लेकर तीखा हमला किया। ढाका में अटकलें हैं कि यूनुस को अगला राष्ट्रपति चुना जा सकता है, क्योंकि मौजूदा राष्ट्रपति, जो हसीना के सहयोगी थे, को उनका कार्यकाल खत्म होने में दो साल बाकी रहते हुए ही हटा दिया गया था। यदि ऐसा होता है और तारिक रहमान भी इसके लिए सहमत होते हैं, तो यह फैसला हसीना की संभावित वापसी से पहले ही हो जाना चाहिए, ताकि राजनीतिक हालात और अधिक न उलझे।


हसीना ने 2009 से 2024 तक के अपने 15 वर्ष के शासनकाल के दौरान हुई ‘गलतियों’ को भी माना। उन्होंने बताया कि कैसे नौकरी और शिक्षा में आरक्षण के विवादित मुद्दे पर प्रदर्शनकारी छात्रों तक उनकी पहुंच की कोशिशें तब नाकाम हो गईं, जब ‘अदृश्य ताकतों’ के इशारे पर छात्रों ने मांगें बदल दीं। उन्होंने कहा, ‘कानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों पर सुनियोजित हमले किए गए। अधिकारियों की हत्या कर दी गई। पुलिस स्टेशनों और चौकियों में आग लगा दी गई। हथियार लूट लिए गए। करीब 3,000 पुलिसकर्मियों की हत्या की गई और उन्हें गंभीर हिंसा का शिकार बनाया गया।’ हसीना ने कहा, ‘मैं एक सीधा सवाल पूछती हूं। ऐसी स्थिति में कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों का क्या फर्ज है? क्या राज्य की जनता की जान और संपत्ति की रक्षा करने की कोई जिम्मेदारी नहीं है? हर देश में, कानून लागू करने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारी होती है कि वे नागरिकों, सरकारी संस्थानों और अपनी जान की रक्षा करें। यह कोई अपराध नहीं है। यह वह कर्तव्य है, जो उन्हें कानून द्वारा सौंपा गया है।’


शेख हसीना की संभावित वापसी तारिक रहमान के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। यदि वह लौटती हैं, तो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना तारिक रहमान की जिम्मेदारी होगी, चाहे हसीना हिरासत में हों या बाहर। मुख्यधारा की राजनीति में शामिल इस्लामी गुट, चरमपंथी तथा पुराने छात्र नेता, सभी उनके विरोधी हैं। अजीब है कि उनका विरोध करने और खुद भी जबर्दस्त विरोध का सामना करने के बावजूद, तारिक रहमान अपनी मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी अवामी लीग के साथ हाथ नहीं मिला सकते। ऐसे में, बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि वह दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी खेमे के अपने विरोधियों और इस क्षेत्र में वैश्विक ताकतों की चालों का सामना कैसे करते हैं।
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कुल मिलाकर, हसीना की ‘घर वापसी’ की योजना का मकसद तुरंत सत्ता हासिल करना नहीं है। उनकी पार्टी, अवामी लीग, भले ही एक अहम राजनीतिक ताकत रही हो, पर अभी उस पर प्रतिबंध लगा हुआ है और निकट भविष्य में उसके सत्ता में आने की कोई उम्मीद नहीं है। इसके बजाय, ऐसा लगता है कि वह बांग्लादेश की राजनीति से अपनी पार्टी के पूरी तरह खत्म होने से पहले उसकी अहमियत बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं। अब यह देखना बाकी है कि उनकी वापसी उन्हें एक आरोपी के तौर पर पेश करती है या फिर एक ऐसे प्रतीक के तौर पर, जिसके इर्द-गिर्द बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर ध्रुवीकृत हो सकती है। उनके सामने दो राजनीतिक विरासतों को बचाने की चुनौती है-अपनी खुद की और अपने पिता की। ऐसा करने के लिए, उनके पास अपने लोगों के अलावा और कोई सहारा नहीं है।
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