शशि कपूर हमारी पीढ़ी के ऐसे कलाकार थे, जिनको हमने सिने-परदे पर कई भूमिकाओं में देखा और सराहा था। और पाया था कि बॉलीवुड की उन विशेष, या आम (लेकिन बहुत लोकप्रिय) फिल्मों में भी वह कुछ ऐसी ऊर्जावान, गतिमय और खिलंदड़े अंदाज वाली तरंगें उठाते थे, जो अन्य दर्शकों की तरह हमें भी कहीं न कहीं स्पर्श करती थीं। भारत में सिने नायकों और सिने तारिकाओं की छवियां इतनी अधिक प्रसारित-प्रदर्शित होती है कि उनसे सबका एक सहज परिचय-सा हो जाता है, और कुछ से तो एक निकटता भी महसूस होने लगती है। यह निकटता इसलिए पनपती है कि हम उनके अभिनय को सराह चुके होते हैं, और अगर वह हमारी पीढ़ी के हुए, तो यह निकटता कुछ और गहरी हो जाती है। हम उनसे बिना मिले हुए भी उनसे 'मिल' चुके होते हैं। शशि कपूर मुझसे दो बरस बड़े थे। मैं उनकी हिंदी फिल्में देखने से भी पहले अंग्रेजी की हाउस होल्डर और शेक्सपिअर वाला देख चुका था और उनकी हिंदी फिल्में भी कुछ तो देखा ही करता था।
सो जब नब्बे के दशक के अंतिम वर्षों में जानकी कुटीर (मुंबई) में उनसे भेंट हुई, तो यह लगा ही नहीं कि मैं उनसे 'परिचित' नहीं हूं। उस शाम शशि जी से मिलने के लिए मुझे वासु भट्टाचार्य ने बुलाया था। मुंबई में मैं दिनेश ठाकुर के साथ ही ठहरा करता था और हम घर से साथ ही निकले थे। पर पृथ्वी थियेटर के पास पहुंचकर दिनेश को 'पृथ्वी' में कोई काम याद आ गया, और वह मुझसे बोले, तुम शशि जी के पास चलो, मैं भी पंद्रह-बीस मिनट में आता हूं। प्रसंगवश यहीं याद कर लूं कि शशि जी और दिनेश में तो सचमुच बहुत निकटता थी। जब शशि कपूर और जेनिफर ने पृथ्वी थियेटर बनाया, तो दिनेश ठाकुर अपने ग्रुप अंक के साथ वहां प्रायः प्रति सप्ताह ही नाटक करते थे।
बहरहाल, मैं जानकी कुटीर के भीतर गया, उस जानकी कुटीर के, जो पृथ्वीराज कपूर की बनवाई हुई थी। तो थोड़ा और भीतर जाने पर मुझे शशि कपूर और सईद जाफरी बैठे हुए दिखाई पड़े। मैंने शशि जी को अपना परिचय दिया और कहा कि वासु दा के निमंत्रण पर यहां आया हूं। वह अत्यंत सहजता से मेरी ओर मुखातिब हुए और कहा, बैठिए, वासु दा और दिनेश भी अभी आ रहे हैं। निश्चय ही वासु दा से उन्हें मेरे भी शामिल होने की खबर मिल चुकी थी। वासु दा और दिनेश भी थोड़ी देर में आ ही गए। बातें चल निकलीं। उस शाम मैंने उनकी प्रशंसा में कहा कि पृथ्वी की स्थापना करके उन्होंने एक बड़ा काम थियेटर के लिए किया है। और यह भी कि मुंबई आने पर मैं 'पृथ्वी' में जरूर आता हूं। मेरी प्रशंसा को उन्होंने पूरी विनम्रता से लिया और बस मुस्कराते रहे। कहा, जरूर ही पृथ्वी आते रहिएगा, हर बार मुंबई आने पर। यह आप ही लोगों के लिए है। आज जब उन्हें उनकी फिल्मों की चर्चा के साथ ही अधिक याद किया जा रहा है, तो यह बताने की जरूरत कुछ अधिक जान पड़ती है कि पृथ्वी समेत शशि कपूर के रंगकर्मी पक्ष की ओर भी ध्यान जाए। वह अभिनेता ही नहीं थे, सोचने-समझने वाले, बुद्धि-विचार वाले व्यक्ति भी थे। और ‘पृथ्वी’ के साथ तो कई रंगकर्मियों का काम जुड़ता चला गया। पृथ्वी का सभागार ही नहीं, कैफे भी रंगकर्मियों, नाट्यप्रेमियों, लेखकों-कवियों-पत्रकारों-चित्रकारों की मिलन-स्थली बना। उसकी गैलरी में चित्र-प्रदर्शनियां लगती रहीं। जाहिर है कि मुंबई के सांस्कृतिक जगत को शशि जी और जेनिफर द्वारा दी गई यह भेंट एक अतुलनीय भेंट है। और यह भेंट उनके कामकाज की एक सराहनीय कड़ी के रूप में हमेशा याद की जाएगी।