रोशनी का त्योहार अब सिर्फ एक हफ्ते दूर है और चूंकि साफ-सफाई और पारंपरिक तैयारियों के साथ ही लक्ष्मी पूजा इस त्योहार का सबसे अहम हिस्सा होती है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इससे समृद्धि आती है। इसलिए यही सही मौका है जब हम समृद्धि, संपत्ति और संपन्नता के बारे में विचार करें। मुझे लगता है कि लक्ष्मी पूजा को दीवाली का हिस्सा इसलिए बनाया गया है, ताकि लोग संपत्ति और समृद्धि के महत्व को समझ सकें और यह भी कि इसे कैसे अर्जित किया जाए।
सो, दीवाली में घर की सजावट के साथ ही इस बार अपनी आय और अपने निवेश को संयोजित करने पर भी विचार करें। पारंपरिक तौर पर सोना या अचल संपत्ति पर भारतीय निवेश करते आए हैं, लेकिन भारतीय शेयर बाजार में निवेश भी एक बेहतर विकल्प हो सकता है। वैश्विक परिदृश्य में भारतीय बाजार को उभरते हुए सितारे की तरह देखा जा रहा है। भारतीय बाजार के प्रति बढ़ते आकर्षण की कई वजहें हैं। इसमें सबसे बड़ा कारण राजनीतिक स्थिरता और 7.5 फीसदी की विकास दर है, जोकि टिकाऊ भी है।
दूसरी बात, भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए ढांचागत बदलाव भी किए जा रहे हैं। इस बदलाव में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) सबसे बड़ा योगदान कर सकता है, जोकि बड़े पैमाने पर विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) को आकर्षित कर रहा है। जीएसटी विधेयक के संसद से पारित होने के बाद स्थितियां बदली हैं, और इन बदलावों से पांच से सात वर्ष बाद लाभ मिलना शुरू हो जाएगा। जीएसटी से चीजें रातों रात नहीं बदलेंगी, लेकिन सुधार की दिशा में यह अहम कदम है।
श्रम और कर सुधारों ने संकेत दिए हैं कि कुछ उद्योगों में संगठित क्षेत्र का विस्तार होना तय है। शेयर बाजार भी ऊंचाई की ओर जा रहा है, जहां खुदरा निवेशकों की भागीदारी बढ़ रही है, जैसा कि म्युच्युल फंड निवेश डाटा से प्रमाणित होता है। भारत में आज एक करोड़ सक्रिय एसआईपी (सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) निवेशक हैं और यह आंकड़ा आगे बढ़ना ही है।
शेयर बाजार के मूल्यांकन के दृष्टिकोण से हम अब भी ऐसी स्थिति में हैं, जहां बाजार में प्रवेश करने और लाभ कमाने की संभावनाएं बनी हुई हैं। विकसित बाजारों में शून्य या नकारात्मक विकास दर तथा वैश्विक विकास की अपेक्षाकृत कम, (जिसे मंदी का रुझान नहीं कहा जा सकता) दर के कारण विकसित बाजारों से उभरते बाजारों की ओर पूंजी का प्रवाह हो रहा है। हालांकि उभरते बाजारों ने पिछले तीन-चार वर्षों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था। इसके बावजूद हमारी घरेलू परिस्थितियां अलग तरह की हैं।
अपने देश में अच्छे मानसून और जीएसटी विधेयक के पारित होने के बाद माहौल बदला है। सरकार परिवहन और रक्षा जैसे क्षेत्रों में पूंजीगत खर्च बढ़ाकर मदद कर रही है। क्षमता के पर्याप्त उपयोग और बैंकिंग क्षेत्र में गैर निष्पादित संपत्तियों से संबंधित परिदृष्य में सुधार होने से निश्चय ही अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। स्मार्ट सिटी, सस्ते आवास जैसी योजनाओं पर ध्यान केंद्रित किए जाने और रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में की गई कटौती से यही संकेत मिलते हैं कि भारतीय बाजार में पर्याप्त क्षमता है। ध्यान रहे कर संग्रह भी बढ़ा है, जिससे यही संकेत मिलते हैं कि लोग खर्च और निवेश दोनों कर रहे हैं। ढांचागत क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों में निवेश से अर्थव्यवस्था को ही मजबूती मिलती है।
यही सही मौका है, जब बाजार में निवेश के बारे में सोचा जाए। हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान एक बुजुर्ग ने मुझसे कहा कि शेयर बाजार तो जुआ है! ऐसी मानसिकता को बदलने की जरूरत है और इस पर वाकई गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि क्या सचमुच शेयर बाजार में निवेश सिर्फ किस्मत का मामला है। अज्ञानता ही ऐसा मकड़जाल बनाती हैं, जिससे संपत्ति के निर्माण में अड़चन आती है और इसका असर लोगों को गरीबी से उबारने के प्रयासों पर पड़ता है। निसंदेह इसके साथ जोखिम भी जुड़े होते हैं, लेकिन समझदारी भरा कदम आपके लिए नए फलक खोल सकता है। शेयर बाजार में निवेश को लेकर धारणा बदलने की जरूरत है। असल में जरूरत निवेश का तरीका बदलने की है। वास्तविकता यह है कि छोटे छोटे निवेश से ही चीजें बदल सकती हैं। आपको बड़े निवेश की जरूरत नहीं है। इसकी शुरुआत पांच सौ रुपये महीने से भी की जा सकती है। इसे सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) से शुरू किया जा सकता है। दीर्घ अवधि के लिए नियमित निवेश भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था में एक बहुत सरल, लेकिन एक प्रभावी तरीका है।
भारत में मुश्किल यह है कि हम अब भी निवेश और शेयर बाजार को लेकर बहुत सहज नहीं हैं। वित्तीय योजनाओं को लेकर एक हिचक होती है और बहुत कम लोग ही सेवानिवृत्ति और बच्चों की शिक्षा जैसी जरूरतों को लेकर किसी पेशेवर वित्त सलाहकार की मदद लेते हैं। किसी वित्त सलाहकार जैसे पेशेवर की सेवा लेना ठीक उसी तरह से है, जैसे हम अपना वाहन खराब होने पर मैकेनिक के पास जाते हैं या बीमार होने पर डॉक्टर के पास। हमें अपने वित्तीय प्रबंधन के तरीके को बदलने की जरूरत है।
इस वित्त वर्ष में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के बीस खरब डॉलर के करीब रहने का अनुमान है और यदि अर्थव्यवस्था जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है, वह कायम रहती है तो यह दस से बारह वर्षों में दोगुना हो सकता है। अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए जरूरी है कि निवेश भी बढ़े और इसमें आम भारतीयों का योगदान भी अहम हो सकता है। अगले दस-बारह वर्षों में भारत की विकास की कहानी एक नए मुकाम तक पहुंच सकती है और इसमें हर किसी की हिस्सेदारी हो सकती है।
लेखक आउटलुक मनी के संपादक हैं