वर्ष 2012 में सामाजिक और राजनीतिक बदलाव को लेकर कई प्रयास हुए हैं, जिससे यह उम्मीद बंधती है कि नया वर्ष हाशिये के लोगों को सहूलियत देने वाला साल होगा। पिछले वर्ष आम आदमी को आंदोलन के केंद्र में ही नहीं, बल्कि सभी क्षेत्रों में सकारात्मक दृष्टि से देखा गया।
यह अच्छा है, लेकिन इसके पीछे एक ठोस दृष्टिकोण का होना बहुत जरूरी है। उसके लिए सामाजिक संरचना में तब्दीली की जरूरत है। उक्त तब्दीली की कानूनी व्यवस्था जब तक नहीं होगी, तब तक आम आदमी के हित की बात वायवीय ही रहेगी। हमारी सामाजिक संरचना में कई प्रकार के परिवर्तन वांछित हैं। हमारी सांविधानिक स्थिति खराब नहीं है, फिर भी हम कई मामलों में पिछड़े क्यों हैं, इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करना आवश्यक है।
वर्ष 2012 के बीतते-बीतते दिल्ली में हुई दरिंदगी ने पूरे देश को शर्मिंदा कर दिया। इसके प्रति जो व्यापक प्रतिक्रियाएं हुई हैं, वे सही हैं। फिर भी मुजरिमों को क्या दंड दिए जाएंगे और आगे महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रशासन कितना कुछ कर पाएगा, यह कहना मुश्किल है।
अगर वाकई हम समाज में जागरण का भाव पैदा करना चाहते हैं, तो मानसिकता बदलने के साथ-साथ महिलाओं को स्वयं-सुरक्षा के प्रति जागरूक बनाना होगा। पुलिस तंत्र में सुधार और अपराधियों के लिए कड़े-से-कड़े दंड का प्रावधान तो जरूरी है ही, लेकिन कम से कम समय में दंडविधान का कार्यान्वयन जब तक नहीं होगा, इसका लाभ नहीं मिल सकता। लिहाजा कानूनी व्यवस्था में शीघ्र परिवर्तन आवश्यक है।
इसके अलावा हमारे समाज में अन्य कई विसंगतियां हैं, उन सबकी रोकथाम की भी व्यवस्था होनी चाहिए। यह एक सफल प्रशासन ही कर सकता है। लेकिन ऐसे प्रयास नए साल में वास्तविकता की धरातल पर कितने उतर पाएंगे, यह समाज पर निर्भर है। मुश्किल यह है कि आज का समाज बहुत कुछ जल्दी भूल जाता है। फॉलो-अप ऐक्शन को लेकर न समाज चिंतित है, न प्रशासन। लगता है, नैतिकता जैसी चीज का लोप होता जा रहा है। इसे बदलना होगा।
यह सही है कि पिछले दिनों राजनीतिक वर्ग के अहंकार और स्वार्थ-वृत्ति के चलते आम आदमी का भरोसा उस पर से कम हुआ है। असल में, जब समाज राजनीतिक वर्ग के पीछे चलता है, तो उसे सही रास्ते पर लाने का साहस समाज के पास नहीं होता है। हमारे यहां राजनीतिक स्वार्थ के लिए एक वर्ग दूसरे की आलोचना करता है। जनहित के पक्ष्ा में सभी एकमत नहीं हैं। यही सबसे बड़ी विडंबना है।
सभी दलों की आंखें वोट-बैंक पर हैं, जिसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। यह जनसेवक कहलाने वालों के लिए ठीक नहीं है। अगले वर्ष ऐसा कोई चमत्कार नहीं होगा कि इस स्थिति में परिवर्तन आ जाए। लिहाजा समाज को खुद ही आगे बढ़ना होगा। अरविंद केजरीवाल जैसे नेता ‘पोल-खोल’ आंदोलन से उम्मीद तो जगाते हैं, पर उनसे बदलाव की कितनी उम्मीद करें? पहले भी भ्रष्टाचार के कई रहस्य सामने आए। लेकिन हम इन सबको ‘कहानियों’ के रूप में पढ़ने के आदी हो गए हैं। इस परंपरा को तोड़ने की जरूरत है, जो दुर्भाग्य से नहीं होता है।
इन सबके अलावा भी कई चुनौतियां हैं, जिससे निपटने की जरूरत है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है, शिक्षा की चुनौतियां। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कई बदलाव की आवश्यकता है, जिसमें पारदर्शिता प्रमुख है। आईआईटी एवं आईआईएम को हम उच्च शिक्षा के शिखर संस्थान मानते हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों को भी उसी स्तर पर लाना होगा।
जल्दबाजी में न कोई केंद्रीय विश्वविद्यालय शुरू किया जाए, न राज्यस्तरीय विश्वविद्यालय। अगर उच्च शिक्षा का स्तर अंकों तक सीमित हो जाए, तो कोई बात बन नहीं सकती। शिक्षा दिखावे के लिए नहीं, बल्कि समाज के समग्र विकास के लिए होना है। और इसके लिए जरूरी है कि महिलाओं में शिक्षा का प्रसार हो। कुछ प्रदेशों में महिलाओं को आगे बढ़ाने की मानसिकता नहीं है, जिसे बदलने में राज्य सरकार तथा स्वैच्छिक संस्थाएं भूमिका निभा सकती हैं।
वर्ष 2012 को जब हम आंदोलनों का वर्ष कहते हैं, तो इसमें छोटे-छोटे आंदोलन पीछे छूट जाते हैं। नए वर्ष में हमें उन छोटे आंदोलनों की भी सुध लेनी चाहिए, जिन पर सत्ता-प्रतिष्ठान चुप्पी साध लेता है। इस कड़ी में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और भूमि सुधार जैसे मुद्दे हो सकते हैं, जो हमेशा समस्यात्मक हैं।
इन पर सुचारू ढंग से विचार नहीं हुआ है। विकास को सही विकास के रूप में दिखना चाहिए। इसमें कुछ अड़चनें जरूर आती हैं, पर जरूरी है कि किसानों की समस्याओं पर किसानों के संगठन फैसला करें, न कि राजनीति के लोग। विदेशी निवेश के बारे में व्यापक विमर्श के बाद जो निर्णय सामने आए, उन्हें लागू किया जाना चाहिए। बहरहाल, नए साल में देश भर में चल रहे छोटे-छोटे आंदोलनों को फायदा जरूर होगा। लेकिन ये आंदोलन यदि अलग-अलग राजनीतिक वर्गों द्वारा प्रायोजित होंगे, तो उससे ज्यादा लाभ की उम्मीद नहीं की जा सकती।