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Sharad Yadav Memory: संघर्षों में तपे नेता थे शरद यादव, सामाजिक आंदोलन में बड़ी भूमिका

रघु ठाकुर
Updated Sat, 14 Jan 2023 09:12 AM IST

सार

छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने वहां काफी ख्याति अर्जित की थी। शरद यादव की पहले कोई स्पष्ट राजनीतिक विचारधारा नहीं थी, हालांकि उनके पिता जी स्वतंत्रता सेनानी थे।
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sharad yadav - फोटो : Social Media


हम लोगों के साहचर्य के दिन बड़े फाकामस्ती के दिन थे। हम लोग साथ-साथ रहते थे, आंदोलन करते थे, पैदल और रिक्शे में घूमते थे। कई बार हम साथ-साथ विभिन्न जेलों में रहे। आंदोलन के दौरान हमारे ऊपर लाठियां चलीं। कई बार जब पुलिस हमारे पीछे पड़ जाती थी, तो हम लोग कहीं दूर जाकर साथ-साथ एक-दो महीने रहते थे। एक बार हम दोनों भूख हड़ताल करते हुए गिरफ्तार हुए थे। मुझे गिरफ्तार करके भोपाल जेल और शरद यादव को बिलासपुर जेल भेज दिया गया था। फिर जब हम लोग जेल से छूटे, तो उसी समय जबलपुर लोकसभा का उपचुनाव होना था, क्योंकि जबलपुर के सांसद का निधन हो गया था। 


हमारी पार्टी ने पहले इस सीट से विष्णु कामत की उम्मीदवारी का एलान भी कर दिया था। हमने 1974 में एक कार्यक्रम में मधु लिमये और जॉर्ज फर्नांडीस को जबलपुर बुलाया था। उस समय जय प्रकाश नारायण का छात्र आंदोलन भी शुरू हो गया था। हम लोगों ने मधु लिमये जी से आग्रह किया कि शरद यादव नौजवान आदमी है, छात्र आंदोलन का नेता रहा है और यह तो उपचुनाव है। एक साल बाद जब चुनाव होगा, तब कामत जी चुनाव लड़ेंगे, इस बार शरद यादव को मौका देना चाहिए। अन्य कई नेताओं ने भी हमारी बात का समर्थन किया। उस समय समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष जॉर्ज फर्नांडीस थे, तो मधु जी ने उन्हें सारी बातें बताईं, फिर वह भी सहमत हो गए और 1974 का जबलपुर का  उपचुनाव शरद यादव लड़े और वहां से जीते थे। तब से वह समाजवादी पार्टी में और जनता पार्टी में भी हमारे साथ रहे। 


मैं शरद जी के 1989 के बाद के जीवन या राजनीतिक सफर पर ज्यादा नहीं बोलना चाहता हूं। वर्ष 1989 से पहले का उनका जीवन संघर्षमय था और संघर्षों से तपकर वह समाजवादी राजनीति में आए थे। वह राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी थे। वह सबके साथ रहे और सबसे अलग हुए। कह सकते हैं कि उन्हें सीढ़ियां चढ़ने और सीढ़ियां तोड़ने में महारत हासिल थी। इंजीनियरिंग के छात्र रहे शरद यादव ने राजनीति में भी सोशल इंजीनियरिंग को महत्व दिया  और सामाजिक न्याय की राजनीति की। कहा जाता है कि मंडल कमीशन लागू करवाने में शरद जी की बड़ी भूमिका थी। लेकिन मैं स्पष्ट कर दूं कि मंडल कमीशन लागू करने की बात जनता दल के घोषणापत्र में शामिल थी। यह विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार की प्राथमिकता में शामिल था, क्योंकि उन्हें पता था कि उनकी सरकार को समर्थन दे रही भारतीय जनता पार्टी उन्हें ज्यादा दिन तक बर्दाश्त नहीं करेगी। भारतीय जनता पार्टी ने जब राम मंदिर का आंदोलन शुरू कर दिया, तो वीपी सिंह ने अपनी सरकार पर खतरा देखते हुए मंडल कमीशन लागू कर दिया। फिर विवाद खड़ा हो गया। 


मंडल कमीशन जो लागू हुआ था, उनमें मंडल कमीशन की सिफारिशों में से मात्र 50 प्रतिशत सिफारिशें ही लागू हुई थीं। मंडल कमीशन लागू होने के समय हमने 'आरक्षण सुधार मंच' के नाम से दिल्ली में एक रैली की थी और हमने उन्हें एक सुझाव दिया था, जिस पर 105 सांसदों के हस्ताक्षर थे। हमने अपने सुझाव में कहा था कि पिछड़ा वर्ग में दो धड़े हैं। एक धड़े में वे जातियां हैं, जिनके पास जमीन और राजनीतिक ताकत है, और दूसरे धड़े में वे जातियां हैं, जो हाथ के हुनर से जीवन-यापन करती हैं। इन दोनों को अलग-अलग रखा जाए। कर्पूरी जी ने जो आरक्षण लागू किया था, वह लोहिया जी के सिद्धांतों पर आधारित था, उसमें उन्होंने दो हिस्से किए थे। 


मगर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने शरद यादव और राम विलास पासवान के सुझाव पर यह गलती की कि दोनों धड़ों को अलग-अलग नहीं किया। इसका परिणाम यह निकला कि पिछड़ा वर्ग में जो ताकतवर जातियां थीं, वे हावी हो गईं। दूसरी तरफ देवीलाल के अलग होने से जाटों ने विद्रोह कर दिया और उधर मुलायम सिंह भी वीपी सिंह से अलग हो गए। इसलिए वीपी सिंह सरकार का पतन हो गया, लेकिन चाहे जिस भी रूप में हो, मंडल कमीशन लागू हो गया। राममनोहर लोहिया का कहना था कि 'पिछड़ा पावे सौ में साठ', लेकिन यहां तो सौ में सत्ताईस ही मिला। 


बहरहाल, वह 1974, 1977, 1989, 1991, 1996, 1999 और 2009 में लोकसभा के लिए विभिन्न जगहों से चुने गए। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार-तीनों राज्यों से चुनकर लोकसभा पहुंचने वाले वह विरल नेता थे। वह राज्यसभा के लिए भी चार बार (1986, 2004, 2014 और 2016) चुने गए। वह नागरिक उड्डयन मंत्री, कपड़ा मंत्री, खाद्य प्रसंस्करण मंत्री, श्रममंत्री और उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं जनवितरण मंत्री रहे। उनका संसदीय सफर मध्य प्रदेश से शुरू हुआ था, जहां से वह दो बार सांसद बने। एक बार उत्तर प्रदेश के बदायूं से भी वह लोकसभा के लिए चुने गए। लेकिन बिहार के मधेपुरा से वह चार बार लोकसभा सांसद बने। इस समय भी वह लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल से जुड़े थे। 
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शरद जी से मेरे बहुत ही आत्मीय और घनिष्ठ रिश्ते रहे। यहां तक कि उनके विवाह का कार्ड जो छपा था, वह भी मेरे नाम से ही छपा था। हम संघर्ष के दिनों के साथी थे और जीवन की धूप-छांव में हमारा साझा था। मेरा सरोकार हमेशा विचारधारा के साथ रहा, तो मैं पार्टी की विचारधारा के साथ जुड़ा रहा और वह सत्ता की दुनिया की तरफ चले गए। उनके साथ बिताए दिनों की यादें मेरे दिल में हमेशा महफूज रहेंगी। उन्हें श्रद्धांजलि एवं नमन। 

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