आज से लगभग दो सदी पहले कालिदास की महान नाट्य कृति ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी। फारस्टर नामक जर्मन यात्री ने लंदन में 1790 की गर्मियों में इस अंग्रेजी अनुवाद को देखा और इतना प्रभावित हुआ कि तुरंत अनुवाद में जुट गया। उसने शाकुंतल का जर्मन अनुवाद 1791 में प्रकाशित किया। जैसा कि प्रसिद्ध है, जर्मन भाषा के महाकवि गेटे शकुंतला को पढ़ अभिभूत हो गए थे। उन्हें इस रचना में जीवन की सौगात मिल गई थी। उनकी मानें, तो पृथ्वी और स्वर्ग सभी का श्रेष्ठ इस रचना में मौजूद है। पिछले सप्ताह कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी के तत्वावधान में शाकुंतल के जर्मन अनुवाद की दो सौ पच्चीसवीं सालगिरह मनाने का आयोजन हुआ, जिसमें जर्मन कंसुलेट भी आए थे।फारस्टर ने शाकुंतलम के अनुवाद के दो महत्वपूर्ण प्रयोजनों का उल्लेख किया था। एक यह कि इससे सांस्कृतिक सहनशीलता का विकास होगा और दूसरा इसके माध्यम से मानव जीवन की विविधता का परिचय होगा। आज जब वैश्वीकरण की आंधी संस्कृति की विविधता को समाप्त करने पर तुली है, तब पारस्परिक सांस्कृतिक संवाद को आगे बढ़ाने की जरूरत और भी प्रासंगिक है।
आज के माहौल में कालिदास की शकुंतला की याद बड़ी शिद्दत से आ रही है। प्राकृतिक सौंदर्य के बीच जन्मी शकुंतला को पेड़-पौधों से बेहद प्यार था। किसी लता में नई कोंपल आई देख उसे बेटे के जन्म सरीखा सुख मिलता था। वह नन्हें मृग छौनों से खेलती थी। एक दिन राजा दुष्यंत आखेट करने जंगल आए। भटक कर आश्रम पहुंचे। वहां मुनि थे नहीं और अतिथि सत्कार का भार शकुंतला पर था। राजा की शकुंतला से भेंट हुई। उन्होंने शकुंतला से प्रणय निवेदन किया और वन प्रांतर में दोनों का गंधर्व विवाह हुआ। जब राजा वापस नगर को जाने लगे, तो उन्होंने एक अंगूठी शकुंतला को दी। यथासमय मुनि और लता, पशु ,पक्षी समेत सारे आश्रमवासियों ने भरे मन शकुंतला को विदाई दी। पर नगर के मार्ग में चलते हुए एक नदी पड़ी और वहीं शकुंतला की अंगूठी उंगली से फिसल कर नदी में गिर गई। राजभवन पहुंचने पर राजा ने शकुंतला को पहचानने से ही इन्कार कर दिया।
शकुंतला की कथा पुरानी है और कवि-कल्पना-प्रसूत है। पर क्या आज हमारे देश की भी हालत उसी शकुंतला की तरह हो रही है? सहस्रों वर्षों में जो वेद, वेदांग, साहित्य, न्याय, आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष आदि विषयों की साधना से निर्मित ज्ञान और तपस्या की जो अंगूठी थी, वह दो सदियों लंबी औपनिवेशिक नदी की धारा में डूबकर खो गई है। अंगूठी ही हमारी पहचान कराने वाली थी। सो अपनी लुप्तप्राय ज्ञानधारा के साथ-साथ हमारी अपनी पहचान भी धूमिल होती और खोती जा रही है।
आज भारत भी शकुंतला और भरत की तरह वनवास में जी रहा है। शकुंतला की तरह भारत को भी अब भारत में यह प्रमाणित करना होगा कि वही भारत है। मिट्टी की उर्वरा शक्ति, जल का जीवन रस, गंधवाही मलय वायु सब कुछ प्रश्नांकित हो रहा है। कालिदास के विराट भारत का भाव अज्ञानवश कइयों की नजर में संदिग्ध होकर दैन्य का बोध करने लगा है। पर उनके काव्य संस्कारों में प्रकृति की उपस्थिति, वाक् और अर्थ की व्यापकता, समग्र जीवन की अवधारणा, नैसर्गिक सुषमा की दिव्यता और भी बहुत कुछ ऐसा है जो आज के अस्त-व्यस्त, ऊबड़-खाबड़ हो रहे रसहीन जीवन को रसवान बनाने में सक्षम है।
-महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति