धर्मग्रंथों और नीतिशास्त्रों में कई ऐसे प्रसंग हैं, जो हमें सेवा-परोपकार की महत्ता बताते हैं। ऐसे प्रसंगों में बताया गया है कि दूसरों की सेवा-सहायता अगर अपने हाथों से की जाए, तो स्वतः मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। महान आध्यात्मिक विभूति स्वामी करपात्री जी महाराज ऐसे ही संत थे, जिन्होंने दीन-दुखियों की सेवा में ही जीवन होम कर दिया था।
एक बार उनके सान्निध्य में कलकत्ता (अब कोलकाता) में शतचंडी महायज्ञ किया जा रहा था। अचानक उड़ीसा (अब ओडिशा) के कुछ क्षेत्रों में भूकंप आया, तो लाखों व्यक्ति बेघरबार हो गए। स्वामी जी ने भंडारे वाले दिन अपने अनुयायियों को आदेश दिया कि भंडारे के लिए एकत्रित तमाम खाद्य सामग्री तुरंत उड़ीसा के भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में ले जाकर पीड़ितों में बांट दी जाए।
स्वामी जी ने अपने प्रवचन में कहा, हमारे धर्मशास्त्रों में आपदा पीड़ितों, असहायों तथा जरूरतमंद लोगों की सेवा सहायता को सर्वोपरि धर्म बताया गया है। सनातन धर्म तो चींटी और पशु-पक्षियों में भी अपने ईश्वर के दर्शन करने की प्रेरणा देता है। फिर इन प्राकृतिक आपदा के मारे मानवों की सेवा-सहायता तो साक्षात नारायण की आराधना ही है।
स्वामी जी के प्रवचन का तुरंत प्रभाव पड़ा और उसी समय लाखों रुपये भूकंप पीड़ितों के सहायतार्थ इकट्ठा हो गए। स्वामी करपात्री जी स्वयं भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचे और सेवा कार्य में जुट गए।