संत ज्ञानेश्वर एक दिन पावन नदी के तट पर भगवान के नाम का जाप कर रहे थे। उनसे कुछ ही दूरी पर एक अन्य संत भी आंखें बंद कर भगवान का ध्यान कर रहे थे। तभी नदी में स्नान के लिए आए एक बच्चे का पैर फिसला और वह पानी के तेज बहाव में बहने लगा।
डूबने का खतरा देख वह बच्चा जोर-जोर से चिल्लाने लगा, मुझे बचाओ, कोई मुझे डूबने से बचाओ। ध्यान कर रहे संत ने बच्चे की आवाज सुनी, नदी में उस बच्चे को बहते हुए देखा और पुनः आंख बंद कर ध्यान में लग गए। संत ज्ञानेश्वर ने भी बच्चे के चिल्लाने की आवाज सुनी और वह तुरंत उठकर उसे बचाने के लिए नदी में कूद पड़े।
गहरे जल में डूबने की परवाह किए बिना वह तैरकर बच्चे को बचा लाए। तट पर आने के बाद उन्होंने ध्यान करते महात्मा से पूछा, क्या तुमने हमें दर्शन देने आए बालरूप भगवान श्रीकृष्ण की आवाज नहीं सुनी। भगवान बालक का रूप धरकर तुम्हारी परीक्षा लेने आए थे कि तुम्हारे हृदय में करुणा-संवेदना की भावना है या नहीं।
याद रखो, किसी निरीह बच्चे को संकट में देखकर, उसकी चीख-पुकार सुनकर भी आंखें बंद किए रखना ध्यान नहीं, पाखंड है। यह सुनकर महात्मा की आंखें खुल गईं। उन्होंने संत ज्ञानेश्वर के समक्ष संकल्प लिया कि वह आज से सेवा और सहायता को ही सर्वोपरि धर्म मानेंगे।