नीतिशास्त्रों में कहा गया है सर्वे भवन्तु सुखिनः। यानी सभी सुखी हों, प्रसन्न हों। जो व्यक्ति सभी के हित की बात कहता है अथवा सभी को अपना बंधु-सखा मानकर सुख-दुख में उसका साथ देता है, वह संत है। ऐसा व्यक्ति अनायास ही प्रभु के साक्षात्कार का अधिकारी बन जाता है।
महान विरक्त संत उड़िया बाबा से कुछ संत मिलने आए। बातचीत के दौरान किसी ने पूछा, गीता का सार क्या है? एक संत ने कहा, भक्ति। दूसरे ने कहा, ज्ञान। तीसरे साधक ने कहा, कर्म। और अंत में पूज्य उड़िया बाबा ने कहा, आप सब जो कहते हैं, वह भी ठीक है, पर मेरी दृष्टि में गीता का सार है, सर्वभूतहिते रताः। सर्वहित के लिए ही संतों तथा भगवान का आविर्भाव होता है। यह हमारे तमाम धर्मशास्त्र बताते हैं।
पूज्य उड़िया बाबा ने गीता के इस तत्व की और व्याख्या करते हुए कहा, धर्म का अर्थ ही सेवा, परोपकार तथा प्राणीमात्र के हित में निहित है। भारतीय संस्कृति में इसलिए न केवल मानव अपितु वृक्षों, नदियों, पशुओं आदि तक में भगवान के दर्शन कर उनकी पूजा व संरक्षण की प्रेरणा दी गई है। कुत्तों, चींटियों तक की भूख-प्यास की तृप्ति को धर्म माना गया है। गीता में दुर्जनों के संहार की प्रेरणा के पीछे भी तो सज्जनों के हित का ही भाव है। सभी संतगण उड़िया बाबा के श्रीमुख से गीता का सारभूत तत्व सुनकर गद्गद हो उठे।