बीते दिनों संसद में 'अध्यक्षीय शोध कदम' (अशोक) की शुरूआत की गई। इसका मकसद सांसदों को विभिन्न विषयों पर विषय से संबंधित विशेषज्ञों द्वारा सटीक जानकारी मुहैया कराना है। बदलती वैश्विक तस्वीर के बीच वर्तमान में माननीयों के लिए इस पहल के काफी मायने हैं। खासकर मौजूदा 16वीं लोकसभा में, जहां पहली बार चुनकर संसद पहंचे सांसदों की वर्तमान संख्या 317 है। स्पष्ट है कि अधिकांश सांसदों के पास संसदीय अनुभव की कमी है।
ऐसे में, लोकसभा में चर्चा के स्तर को बेहतर बनाए रखना और अधिकाधिक सांसदों की भागीदारी सुनिश्चित करना यकीनन लोकसभाध्यक्ष के सामने एक बड़ी चुनौती है। खासकर तब, जब चर्चा के लिए उठाए जाने वाले मुद्दों की जटिलता भी पिछले दशकों के मुकाबले कहीं अधिक बढ़ी है। मसलन, वर्तमान लोकसभा में करीब 30 फीसदी सांसद स्वयं को किसान या कृषि पृष्ठभूमि से जुड़ा बताते हैं, मगर यह मुमकिन नहीं कि सभी को डब्ल्यूटीओ, जीएम फसल, उर्वरक सब्सिडी, खाद्य सुरक्षा और उससे जुड़ी अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों की समझ हो! इसी तरह, विदेश नीति पर चर्चा करने को इच्छुक किसी सांसद के लिए ऊर्जा स्रोत, रक्षा सौदे, यूरेनियम, निवेश, मेक इन इंडिया, रोजगार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसे आर्थिक मामलों को भी समझना अनिवार्य होना चाहिए।
वैसे भी भूमंडलीकरण के दौर में नीति-निर्माताओं के सामने जटिलता और दबाव काफी बढ़ा है। लिहाजा राष्ट्रीय महत्व के सभी विषयों पर विशेषज्ञों से जानकारी लेते रहना जनप्रतिनिधियों के लिए अत्यंत आवश्यक है। हालांकि संसद में पुस्तकालय और शोध आदि की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन जटिलतम विषयों पर विशेषज्ञों का निष्पक्ष ज्ञान बेहद अहम साबित होगा। इस अध्यक्षीय शोध कदम में दोतरफा संवाद स्थापित होगा, जिसमें संसद सदस्य अपने फीडबैक के साथ-साथ अपने सुझाव भी साझा कर सकेंगे।
सुखद है कि लोकसभा अध्यक्ष से इस तरह की पहल करने का निवेदन स्वयं सांसदों ने ही किया। इससे पता चलता है कि सांसद गंभीर चर्चा करने को इच्छुक हैं। लोकसभा के पिछले एक वर्ष के कार्यकाल से यह स्पष्ट भी होता है। पिछले एक वर्ष में लोकसभा ने 15-20 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ा है। वर्ष 1992 के बाद पहली बार इसी दरम्यान सर्वाधिक बैठकें हुईं, 1993 के बाद सर्वाधिक कार्य घंटे हुए, प्रश्नकाल अपेक्षाकृत बेहतर रहा और पिछले चार सत्रों की उत्पादकता 100 फीसदी से ज्यादा रही। इतना ही नहीं, पहली बार चुनकर आए करीब 250 सांसदों ने भी विभिन्न चर्चाओं में हिस्सा लिया।
चूंकि टीवी पर लोकसभा का सीधा प्रसारण लोगों को दिखाता है कि उनके प्रतिनिधि सदन और देश के प्रति कितने गंभीर हैं, और उनकी चर्चा का स्तर क्या है, लिहाजा अध्यक्षीय शोध कदम की शुरुआत लाजिमी मानी गई। अब जरूरत सांसदों को इस अध्यक्षीय शोध कदम का अधिकाधिक इस्तेमाल कर अपनी चर्चा के स्तर को सुधारना है। उन्हें समझना होगा कि चर्चा के सर्वोच्च मंच संसद में केवल जबर्दस्त हंगामा मचाना ही उनका काम नहीं है, बल्कि तर्कपूर्ण ढंग से अपनी बात कहना भी उनकी बड़ी जवाबदेही है। वैसे भी, संसदीय इतिहास में नेता अपनी तर्कपूर्ण चर्चा के लिए ही याद किए जाते हैं, न कि व्यवधान पैदा करने के लिए। ऐसे में मौजूदा मानसून सत्र की शुरुआत से ही मच रहे घमासान के जल्दी खत्म होने और गंभीर चर्चा शुरू होने की उम्मीद पालना भी स्वाभाविक है। सवाल अंततः सांसदों की छवि का है, जिन्हें पार्टी लाइन आधारित व्यवधान से ऊपर दिखना चाहिए।