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अपने गिरेबान में भी झांककर देखें

Mon, 02 Dec 2013 08:53 PM IST
कुमार प्रशांत/लेखक
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तहलका पत्रिका के घर-आंगन में जो हो रहा है, उसकी फिक्र कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी को इतनी क्यों है, यह जानने से ज्यादा परेशानी मुझे इस बात की है कि कलमकारों को इसकी जैसी और जितनी चिंता होनी चाहिए, वैसी क्यों नहीं है!
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यह एक तरुण तेजपाल का मामला तो है ही, यह हमारे अनगिनत तरुण तेजपालों का मामला भी है, जो यह मानते हैं कि पत्रकार की नेमप्लेट और कलम चलाने की योग्यता उन्हें सब कुछ करने और हर किए से छूट जाने की छूट देती है।

पत्रकारिता की दुनिया में पैसों का, पांचसितारा जीवन-शैली का, तड़क-भड़क का, सत्ताधारियों पर नकेल कसने का भी और उनकी अनुकंपा भी बनी रहे, ऐसा संतुलन साधने का चलन जिस तरह मजबूत किया जा रहा है, उसने हमारी कलमों में स्याही के बजाय शराब और मिथ्याचार भरने का काम किया है।
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थिंक नाम से जैसा आयोजन गोवा में तहलका ने किया था, वैसे आयोजनों का फैशन क्यों चल पड़ा है? तहलका के इस आयोजन का खर्चा किसने दिया?

अभी वहां भाजपा की सरकार है, तब कम रकम मिली, पिछली बार जब वहां कांग्रेस की सरकार थी, तब तरुण तेजपाल 45 लाख रुपये झटकने में सफल हो गए थे।

फिल्मी सितारे, खिलाड़ी, उद्योगपति, राजनीति के वे सारे पात्र, जिन्हें रात-दिन कोसते रहते हैं हम, उन्हीं सबको जुटाकर, सार्वजनिक पैसों का जुगाड़ बिठा कर, कैसा और क्या चिंतन करते हैं आप?

कोई राजदीप सरदेसाई वर्ष का भारतीय चुनने में लगा है, कोई आमिर खान साक्षरता अभियान चला रहा है, कोई अमिताभ बच्चन बाघों को बचाने की मुहिम में लगा है, कोई सचिन तेंदुलकर बच्चों को स्कूल भेजने में जुटा है।

आप सोचकर देखिए कि इन सारे प्रयासों में और शबाना आजमी तथा हेमा मालिनी के दुनिया का सबसे शुद्ध पानी बेचने में, अमिताभ बच्चन के ठंडक पहुंचाने वाला तेल बेचने में क्या फर्क है?

निराशा के उद्वेग में या इन महानुभावों के सद्प्रयासों को कम करने की कोशिश में मैं यह नहीं लिख रहा हूं। मैं देखता हूं कि कोई राजदीप सरदेसाई जिसे साल का भारतीय चुनते हैं, वह भारत तो जानता ही नहीं है, तो सवाल यह खड़ा होता है कि वे ऐसी सारी कसरत क्यों करते हैं।

गुलाम भारत में शिक्षा के प्रसार की अच्छी भावना से मदनमोहन मालवीय ने हिंदू विश्वविद्यालय बनाया था। तरुण तेजपाल के थिंक जैसा ही वह आयोजन था, जिसमें उन्होंने उस वक्त के तमाम सितारों को, अपनी तमाम चमक-दमक के साथ बुलाया था।

ब्रितानी साम्राज्य का सबसे बड़ा नुमाइंदा भी था वहां और एनी बेसेंट भी थीं और सारे राजे-रजवाड़े भी थे।

वहां दक्षिण अफ्रीका से वापस भारत लौटे बैरिस्टर एमके गांधी भी बुलाए गए थे। कह सकते हैं हम कि वह भारत आने के बाद दिया गांधी का पहला ही गहरा व्याख्यान था और उस व्याख्यान ने काशी की गंगा में आग लगा दी थी।

वर्तमान व भविष्य के आज के तमाम तरुण तेजपालों को वह व्याख्यान पढ़ना चाहिए! या फिर वह पत्र पढ़ना चाहिए, जो नमक सत्याग्रह शुरू करने से पहले गांधी ने तत्कालीन वायसरॉय को लिखा है। मैं नहीं कह रहा हूं कि हम महात्मा गांधी बन जाएं, पर देश-समाज को देखने की दृष्टि तो हमारी बननी चाहिए।

गोवा की घटना के बाद से हर बीतते दिन के साथ तरुण तेजपाल ने जैसे पैंतरे बदलने शुरू किए, उसने उनका असली चेहरा सामने ला दिया।

तब तो उनमें और निर्भया के साथ बलात्कार करने वालों के मानस में फर्क कर पाना भी कठिन हो गया।

राजनीतिक दलों को इसमें खींच लाने की चाल भी उन्होंने ही चली। इससे साबित यही हुआ कि उनकी माफी, उनका इस्तीफा सब बनावटी था और वे शातिर अपराधी की तरह हमारी आंखों में धूल झोंकने की कोशिश में थे।

और शोमा चौधरी! अपने वक्त की एक सुलझी हुई, शक्तिशाली कलम का यह अवसान बहुत पीड़ादायक है। शोमा यह फैसला करने में चूक गईं कि मैनेजिंग एडिटर और एक नागरिक की भूमिका कैसे अलग होती है।

किसकी जिम्मेदारी की रेखा कहां से शुरू होती है और कहां खत्म होती है, यह विवेक नहीं रखने के कारण आज सारी लकीरें मिट गई हैं और तहलका शायद अपना अस्तित्व समेटने को विवश होगा।
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