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धर्मनिरपेक्ष समाज में जीना

Tue, 09 Jul 2013 10:37 PM IST
डेविड ब्रूक्स
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सबसे पहले मैं आपको बता दूं कि यह आलेख एक किताब के बारे में है। वर्ष 2007 में चार्ल्स टेलर की पुस्तक ए सेक्यूलर एज के प्रकाशन के बाद से ही अकादमिक जगत के लोगों ने मुझे इसके बारे में बता-बताकर पागल बना दिया है। इसको लेकर गोष्ठियां, सम्मेलन एवं परिचर्चाएं आयोजित की गईं, लेकिन अकादमिक जगत के बाहर यह किताब बिल्कुल गायब है। इसकी वजह है कि यह किताब करीब 800 पृष्ठों की है, जो सघन शब्दजालों से घिरी है। विचारों की दुनिया के बारे में लिखने वाले किसी भी व्यक्ति की तरह मैं टेलर के विचारों को संक्षेप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हूं कि हमारे समय में जीना कैसा लगता है। आशा है कि मैं इस किताब के प्रति क्रूरता दिखाए बिना ऐसा कर पाऊंगा।
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टेलर की तहकीकात इस सवाल से शुरू होती है कि पश्चिमी समाज में वर्ष 1500 में ईश्वर पर विश्वास नहीं होना लगभग असंभव क्यों था, जबकि 2000 में हममें से अनेक लोगों के लिए ऐसा मानना न केवल आसान हो गया, बल्कि कई को यह जरूरी भी लगा? इस तरह हम एक व्यापक पवित्र ब्रह्मांड से मौजूदा दुनिया में आए हैं, जहां ईश्वर में आस्था एक विकल्प है, जिस पर कुछ लोग भरोसा करते हैं और कुछ नहीं करते। और बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जो इन दोनों के बीच में रहते हैं। आम तौर पर यह कहानी अंतर बताने के लिए सुनाई जाती है। तभी दुनिया की हकीकत को उजागर करने के लिए परिदृश्य में विज्ञान आया और लोगों ने आस्था के भ्रम से छुटकारा पाना शुरू कर दिया। धार्मिक भावना ने वैज्ञानिक तथ्यों को रास्ता दिया।

टेलर इस कहानी को खारिज करते हैं। वह धर्मनिरपेक्षता को व्यापक रूप से विज्ञान एवं आस्था, दोनों के लिए एक विचित्र सिद्धि के रूप में देखते हैं। मानव की न केवल विज्ञान, बल्कि कला, साहित्य, शिष्टाचार, दर्शन, अध्यात्म और धार्मिक आचार को समझने की ललक ने प्रकृति के बारे में हमारी समझ को विकसित किया है। शेक्सपीयर हमें चरित्र को ज्यादा जटिल रूप में देखने में मदद करते हैं। रीति-रिवाजों या लोकाचार में आई बेहतरी की वजह से निर्दयता, फांसी और सामाजिक क्रूरता के अन्य रूप हमें पहले से कम आनंदित करते हैं। अब हममें यह समझ बढ़ी है कि प्रकृति किस तरह से कार्य करती है।
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इन उपलब्धियों ने ही सार्थक जीवन के विशुद्ध मानवीय स्वरूप की संरचना को संभव बनाया। इससे लोगों के लिए ईश्वर मुक्त सार्थक जीवन जीना संभव हो गया-जैसे कोई चित्रकार कला को समर्पित हो जाता है या कोई वैज्ञानिक  तकनीकी ज्ञान में डूब जाता है। लेकिन टेलर आगे कहते हैं कि इन उपलब्धियों ने हर किसी से (चाहे वह आस्तिक हो या नास्तिक) जीवन में ज्यादा नैतिकता की मांग की। ब्रह्मांड में अपने लिए कोई सहज जगह सुनिश्चित करने के बजाय धर्मनिरपेक्ष समाज में किसी अच्छे व्यक्ति से अपेक्षा होती है कि वह जीवन का निर्माण करे।

सुधार के कामकाज में शामिल करने के लिए लोगों को ज्यादा से ज्यादा सक्रिय होने के लिए कहा गया। धार्मिक आस्था या अनास्था व्यक्तित्व विकास के लिए व्यक्तिगत पसंद की चीज बन गई।

चेतना में आए इस परिवर्तन ने कुछ नकारात्मक पहलुओं को भी आगे बढ़ाया। जब आस्था व्यक्तिगत पसंद की चीज बन गई, तो आस्तिकों के मन में भी काफी संदेह उपजने लगे। जैसा कि टेलर की पुस्तक के एक उदार प्रशंसक के ए स्मिथ ने टिप्पणी की है, हम संदेह करने के बजाय विश्वास ही नहीं करते; हम संदेह करते हुए विश्वास भी करते हैं।

टेलर हमारे समाज के प्रति बेहद आलोचनात्मक हो सकते हैं, लेकिन वह कृतज्ञ एवं उत्साहित हैं। हम एक आध्यात्मिक बंजर भूमि की तरफ नहीं बढ़ रहे हैं, जैसी कल्पना रूढ़िवादियों की है। वह कहते हैं कि ज्यादातर लोग उत्कृष्टता के दायरे के प्रति उदासीन होने के लायक नहीं हैं। टेलर लिखते हैं कि अमरत्व के प्रति चाह तुच्छ या बचकाना चीजें नहीं हैं, जैसा कि इसे आमतौर पर चित्रित किया जाता है।

लोग अब अलग-अलग तरीकों के विस्मयकारी वैविध्य की पूर्णता का एहसास करने में सक्षम हैं। लेकिन टेलर एक सामान्य शैली देखते हैं। वह उत्कृष्टता, विशेष रूप से भौतिक जगत से अलग दुनिया में रहना नहीं चाहते। टेलर बताते हैं कि हम अब भी शुद्ध भौतिकवाद की तरफ नहीं फिसल रहे हैं। बल्कि हम तेजी से दौड़ते हुए आध्यात्मिक बहुलवाद की ओर बढ़ रहे हैं। पूर्णता की तलाश करने वाले लोग पिछले 500 वर्षों के दौरान अर्जित बौद्धिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक लाभों की फसल काटने में सक्षम हैं।

रूढ़िवादी आस्तिक तात्कालिक समय में इस तरह के अलग तनाव में जीते हैं कि मानवता की श्रेष्ठताओं को वे अपने धर्मों के केंद्रीय रहस्यों के साथ किस तरह जोड़ें। यह बहुलवाद विखंडन को जन्म देकर विकल्पों को उथला बना सकता है, पर टेलर उन्हें अलग कर सकते हैं। लेकिन यह कहना ज्यादा सही होगा कि यह धर्मनिरपेक्ष युग रूढ़िवादयुगीन विश्वासों और मूर्खताओं पर प्रहार करता है और शानदार आध्यात्मिक उपलब्धियों को मंजूरी देता है।

मैं बेहद सरलता से कहना चाहूंगा कि टेलर की यह पुस्तक काफी समृद्ध एवं जटिल है, लेकिन जिसने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह है, लेखक की धर्मनिरपेक्ष दृष्टि, जिसमें खुलापन तो है ही, कुछ आध्यात्मिक कठोरताएं भी हैं, जो मानव स्वभाव में मजबूत एवं चिरस्थायी तत्व धार्मिक प्रेरणा से संचालित है।
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