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मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल: पहले बजट से जुड़ीं लोगों की उम्मीदें

बिंदू डालमिया
Updated Sun, 30 Jun 2019 04:26 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर

नई सरकार को बने हुए एक महीना हो चुका है और आते ही वह अपने काम में जुट गई है। अब समय बजट का है, जिसे लेकर काफी उम्मीदें हैं और इस आशावाद की पर्याप्त वजहें भी हैं। सरकार के सामने चुनौती है कि वह कितनी तेजी से अर्थव्यवस्था की गति तेज करती है, आंतरिक ग्रोथ बढाती है और आर्थिक तौर पर दुनिया में एक बड़ी ताकत के तौर पर उभारकर दिखाती है। भारत को मध्य आय अर्थव्यवस्था बनने के लिए सात फीसदी की आर्थिक विकास दर से आगे बढ़कर इसे दोहरे अंकों पर ले जाकर सबको रोजगार देने पर ध्यान देना होगा। अभी सात फीसदी की वृद्धि दर बेशक अच्छी महसूस हो रही हो, लेकिन विकासशील देश को गरीबी से उबरने के लिए ज्यादा वृद्धि चाहिए। लिहाजा सात फीसदी की विकास दर को 10 फीसदी पर पहुंचना चाहिए, फिर साल दर साल इसे आगे बढ़ना चाहिए।

राष्ट्रीय और वैश्विक तौर पर चुनौतियां बड़ी हैं, लेकिन अवसर भी उतने ही बड़े हैं। भारत इस साल दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। तब भारत की अनुमानित अर्थव्यवस्था तीस खरब डॉलर से ज्यादा की हो सकती है। यह इस पर निर्भर करेगा कि हम अपने दरवाजे कारोबार के लिए कैसे खोलते हैं और स्थानीय उद्योगों को कैसे मजबूत करते हैं। भारतीय उद्योग और विदेशी निवेश, दोनों के लिए जरूरत ऐसी होनी चाहिए कि रोजगार सृजित हो, जो 45 साल में सबसे नीचे है और जीडीपी 2018-19 में 6.8 फीसदी पर है। सरकार इन बड़ी चुनौतियों से वाकिफ भी है, इसीलिए सरकार गठित होने के एक हफ्ते के भीतर ही इसे लेकर दो कमेटियां गठित कर इस पर खास ध्यान देने का संकेत दिया गया।



चीन और अमेरिका के बीच चल रहे व्यापार युद्ध से भारत को ज्यादा फायदा हो सकता है। हमें पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को एहसास कराना चाहिए कि भारत उनके लिए कहीं ज्यादा मुफीद साबित हो सकता है। यहां सप्लाई चेन तो उम्दा है ही, साथ ही यहां राजनीतिक स्थिरता है और श्रम की लागत कम होने के साथ-साथ देश विविधताओं से भरा हुआ भी है।

विकास दर की गाड़ी को पटरी पर लाकर नरेंद्र मोदी को अपने इस विश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए कि यह दर खुद ब खुद बढ़ती रहेगी। एक बेहतर देश के लिए  जरूरी है कि उसकी कंपनियां अच्छा लाभ कमाएं और कर्ज कम हो। उम्मीद है कि वित्त मंत्री मध्यमार्गी, राइट विंग, बिजनेस समर्थकों के साथ इन सारे पहलुओं पर ध्यान देंगी और इन पहलुओं पर आगे बढ़ेंगी। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल की मूल सोच भी यही थी।

एनडीए-3 का पहला बजट हमारे ग्रोथ इंजन को हर स्तर पर आगे बढ़ाने वाला रहे। उदाहरण के लिए, खपत बढ़े, निजी निवेश बढ़े और सरकार की काम करने की क्षमता भी बढ़े। एनडीए-2 की नीति भी संरचना और निर्यात सेक्टर को आगे बढ़ाने की थी। बजट में रियल एस्टेट सेक्टर पर ध्यान देना चाहिए। इस सेक्टर को घाटे से उबारने की जरूरत है। अगर यह क्षेत्र पटरी पर आ गया, तो रोजगार बढ़ेगा और मध्यवर्ग के लोगों के घर की आवश्यकताएं भी पूरी होंगी। इसी तरह सैन्य साजो सामान, टेलीकॉम उपकरण और मोबाइल फोन उत्पादन पर ध्यान देने की जरूरत है।
 

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सांकेतिक तस्वीर
नई सरकार को बने हुए एक महीना हो चुका है और आते ही वह अपने काम में जुट गई है। अब समय बजट का है, जिसे लेकर काफी उम्मीदें हैं और इस आशावाद की पर्याप्त वजहें भी हैं। सरकार के सामने चुनौती है कि वह कितनी तेजी से अर्थव्यवस्था की गति तेज करती है, आंतरिक ग्रोथ बढाती है और आर्थिक तौर पर दुनिया में एक बड़ी ताकत के तौर पर उभारकर दिखाती है। भारत को मध्य आय अर्थव्यवस्था बनने के लिए सात फीसदी की आर्थिक विकास दर से आगे बढ़कर इसे दोहरे अंकों पर ले जाकर सबको रोजगार देने पर ध्यान देना होगा। अभी सात फीसदी की वृद्धि दर बेशक अच्छी महसूस हो रही हो, लेकिन विकासशील देश को गरीबी से उबरने के लिए ज्यादा वृद्धि चाहिए। लिहाजा सात फीसदी की विकास दर को 10 फीसदी पर पहुंचना चाहिए, फिर साल दर साल इसे आगे बढ़ना चाहिए।

राष्ट्रीय और वैश्विक तौर पर चुनौतियां बड़ी हैं, लेकिन अवसर भी उतने ही बड़े हैं। भारत इस साल दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। तब भारत की अनुमानित अर्थव्यवस्था तीस खरब डॉलर से ज्यादा की हो सकती है। यह इस पर निर्भर करेगा कि हम अपने दरवाजे कारोबार के लिए कैसे खोलते हैं और स्थानीय उद्योगों को कैसे मजबूत करते हैं। भारतीय उद्योग और विदेशी निवेश, दोनों के लिए जरूरत ऐसी होनी चाहिए कि रोजगार सृजित हो, जो 45 साल में सबसे नीचे है और जीडीपी 2018-19 में 6.8 फीसदी पर है। सरकार इन बड़ी चुनौतियों से वाकिफ भी है, इसीलिए सरकार गठित होने के एक हफ्ते के भीतर ही इसे लेकर दो कमेटियां गठित कर इस पर खास ध्यान देने का संकेत दिया गया।

चीन और अमेरिका के बीच चल रहे व्यापार युद्ध से भारत को ज्यादा फायदा हो सकता है। हमें पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को एहसास कराना चाहिए कि भारत उनके लिए कहीं ज्यादा मुफीद साबित हो सकता है। यहां सप्लाई चेन तो उम्दा है ही, साथ ही यहां राजनीतिक स्थिरता है और श्रम की लागत कम होने के साथ-साथ देश विविधताओं से भरा हुआ भी है।

विकास दर की गाड़ी को पटरी पर लाकर नरेंद्र मोदी को अपने इस विश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए कि यह दर खुद ब खुद बढ़ती रहेगी। एक बेहतर देश के लिए  जरूरी है कि उसकी कंपनियां अच्छा लाभ कमाएं और कर्ज कम हो। उम्मीद है कि वित्त मंत्री मध्यमार्गी, राइट विंग, बिजनेस समर्थकों के साथ इन सारे पहलुओं पर ध्यान देंगी और इन पहलुओं पर आगे बढ़ेंगी। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल की मूल सोच भी यही थी।

एनडीए-3 का पहला बजट हमारे ग्रोथ इंजन को हर स्तर पर आगे बढ़ाने वाला रहे। उदाहरण के लिए, खपत बढ़े, निजी निवेश बढ़े और सरकार की काम करने की क्षमता भी बढ़े। एनडीए-2 की नीति भी संरचना और निर्यात सेक्टर को आगे बढ़ाने की थी। बजट में रियल एस्टेट सेक्टर पर ध्यान देना चाहिए। इस सेक्टर को घाटे से उबारने की जरूरत है। अगर यह क्षेत्र पटरी पर आ गया, तो रोजगार बढ़ेगा और मध्यवर्ग के लोगों के घर की आवश्यकताएं भी पूरी होंगी। इसी तरह सैन्य साजो सामान, टेलीकॉम उपकरण और मोबाइल फोन उत्पादन पर ध्यान देने की जरूरत है।
 

नई वित्त मंत्री को इन बातों पर गौर करना चाहिए। मंदी के मद्देनजर प्रत्यक्ष कर संग्रह बढ़ाने की जरूरत है। करदाताओं की छूट सीमा पांच लाख रुपये तक होनी चाहिए। ऐसे ही, पीएम किसान जैसी सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए 75,000 करोड़ रुपये का प्रावधान करने की जरूरत है, जिसके बारे में चुनाव पूर्व अंतरिम बजट में व्यवस्था की गई थी। हालांकि बजट में संतुलन बिठाना वित्त मंत्री के लिए वाकई कठिन होगा।

समाज के सभी वर्गों को आर्थिक तौर पर राहत देने की जरूरत है। यानी कर राजस्व के लक्ष्य कम किए जाएं, साथ ही कर आतंकवाद भी खत्म हो। यह 2013 में तब शुरू हुआ, जब आयकर अधिकारियों को अतार्किक राजस्व लक्ष्य दे दिए गए। इसके बाद उन्होंने लोगों को नाहक परेशान करना शुरू कर दिया।

फंड जुटाने के लिए गैर उत्पादक पब्लिक सेक्टर की संपत्तियां बेची जाएं। लेकिन उससे जो फंड इकट्ठा हो, उससे बजट घाटा संतुलित करने का काम नहीं हो, बल्कि उसका इस्तेमाल उत्पादक कामों में हो। ऐसे ही निवेश का इस्तेमाल असरदार तरीके से जनसेवाओं और संरचना में हो।

एनडीए-2 ने आयुष्मान भारत महत्वाकांक्षी योजना पेश की है। इस पर जीडीपी का 1.3 फीसदी नहीं, बल्कि तीन फीसदी खर्च हो। वहीं शिक्षा में 2.9 की जगह छह फीसदी प्रावधान होना चाहिए। एनडीए-2 ने जिस तरह से सामाजिक कल्याण की योजनाएं बनाईं, आजादी के 75 साल पूरे होने पर उसी तरह की योजना शिक्षित भारत के लिए होनी चाहिए। सबको शिक्षा उसी तरह दी जानी चाहिए, जैसे 2022 तक सबको स्वास्थ्य सुविधा और घर देने का लक्ष्य है।

किसी भी सरकार का पहला बजट सबको खुश करने वाला होना चाहिए। शायद ही कोई सरकार सख्त बजट पेश करना चाहती हो। लेकिन मुश्किल समय में कड़े फैसले लिए जाते हैं। ऐसे में यह देखने वाली बात होगी कि मोदी आर्थिक तौर पर बेहतरी के लिए क्या करते हैं। इसी आधार पर इतिहास उनका मूल्यांकन भी करेगा।

(लेखिका नीति आयोग में राष्ट्रीय वित्त समेकित कमेटी की चेयरपर्सन हैं.)
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