आज हर ओर श्रम सुधारों की गूंज है। अभी पिछले महीने मोदी सरकार ने भारत को एक वैश्विक विनिर्माण का केंद्र बनाने की मुहिम के तहत महत्वपूर्ण श्रम सुधारों की घोषणा की। दरअसल, हमारे कई श्रम कानून काफी पुराने हैं, और इनकी जड़ें अंग्रेजों के समय में मिलती है। अधिकांश लोगों का मानना है कि अगर 'मेक इन इंडिया' के नारे को हकीकत में बदलना है, तो इन कानूनों की मरम्मत की जरूरत होगी। गौरतलब है कि मोदी ने श्रम कानूनों को सरल व कारगर बनाने और सरकारी पर्यवेक्षकों के उत्पीड़न को रोकने के लिए फैक्टरियों की जांच प्रणाली को पारदर्शी बनाने का वायदा किया हुआ है। आज, भारत के सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी महज 15 फीसदी है। मगर व्यापक असंगठित क्षेत्र वाले, और संगठित क्षेत्र के भीतर भी अनौपचारिक कार्यबल की बड़ी तादाद वाले देश में आर्थिक प्रगति और निवेश में तेजी लाने के लिए श्रम सुधारों के वायदे को पूरा करना आसान नहीं होगा। यह तभी मुमकिन है, जबकि दूसरे मोर्चों पर भी सुधार किए जाएं। सबसे पहली जरूरत कौशल विकास की है।
उल्लेखनीय है कि इकोनॉमिक सर्वे ऑफ इंडिया 2007-08 के मुताबिक देश में कुल कार्यबल का 93 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि कुल कार्यबल का तकरीबन 52 फीसदी हिस्सा कृषि श्रमिकों का है। मगर कृषि क्षेत्र की धीमी विकास दर की वजह से इन श्रमिकों का बड़ा हिस्सा हर वर्ष रोजगार की तलाश में शहरी और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन कर जाता है। कमजोर स्थिति, कम मेहनताना और सामाजिक सुरक्षा का अभाव असंगठित क्षेत्र के इन अनौपचारिक रोजगारों की मुख्य विशेषताएं हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) द्वारा जारी नए आंकड़ों के मुताबिक भारत में गैर-कृषिगत क्षेत्र में कार्यरत हर चार में से तीन लोग अनौपचारिक क्षेत्र में आते हैं। अनौपचारिक क्षेत्र के इन कर्मचारियों में से 80 फीसदी किसी लिखित अनुबंध के दायरे में नहीं आते, और इनमें से 72 फीसदी को सामाजिक सुरक्षा का कोई भी लाभ नहीं मिलता। राज्यवार वितरण को देखें, तो पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में इन अनौपचारिक श्रमिकों का प्रतिशत सर्वाधिक है, जबकि उत्तर-पूर्वी राज्यों, हिमाचल प्रदेश और गोवा में न्यूनतम है। ऐसे में, सवाल उठता है कि आखिर इस संदर्भ में कौन-सी चुनौतियां हैं, और इनसे कैसे निपटा जा सकता है?
गौरतलब है कि अब तक इस विषय पर राष्ट्रीय विमर्श का फोकस 'श्रम लोचशीलता' पर रहा है। मगर यह सिक्के का एक ही पहलू है। प्रगतिशील श्रम संबंधों में यह भी निहित है कि मानव संसाधन और श्रमिकों के कौशल विकास पर भी निवेश किया जाए। इस मामले में जर्मनी से सबक सीखा जा सकता है। यहां के औद्योगिक संबंधों की महत्वपूर्ण विशेषता है, निर्णय निर्माण में कर्मचारियों की भागेदारी। जर्मनी में श्रमिक परिषदें कार्यस्थल पर कर्मचारियों को प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराती हैं, और उन्हें महत्वपूर्ण शक्तियां भी हासिल होती हैं।
पिछले हफ्ते इंडो-जर्मन सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम के तहत एक वार्ता सत्र का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता थे, नई दिल्ली की शिव नडार यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर पब्लिक अफेयर्स एंड क्रिटिकल थ्योरी (सी-पैक्ट) के निदेशक प्रोफेसर दीपांकर गुप्ता। दरअसल गुप्ता और उनके सहयोगियों ने हाल ही में एक प्रारूप तैयार किया है, जिसमें औद्योगिक विवाद अधिनियम में सुधार के सुझाव दिए गए हैं, ताकि पारस्परिक सहमति से बने एक कानूनी फ्रेमवर्क के तहत नियोक्ताओं और श्रमिकों के हितों को सुनिश्चित किया जा सके।
जैसा कि गुप्ता उल्लेख करते हैं, विकसित बाजार आधारित अर्थव्यवस्थाओं में भी श्रम लोचशीलता का मतलब यह नहीं होता कि किसी श्रमिक को जब चाहे काम पर रखा जाए, और फिर अकारण नौकरी से निकाल दिया जाए। श्रम लोचशीलता के साथ श्रमिकों को मिलने वाले लाभों और मुआवजों की सर्वत्र एक-समान व्यवस्था की भी बात होनी चाहिए। इससे हमारी अर्थव्यवस्था पर न केवल अनौपचारिक श्रम का बोझ घटेगा, बल्कि वर्तमान में औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत आने वाले कर्मचारियों के अलावा पूरे औद्योगिक जगत के विभिन्न स्तरों पर श्रमिकों के हितों की सुरक्षा भी हो सकेगी।
गुप्ता ने हाल ही में एक आलेख में लिखा, 'सच तो यह है कि औद्योगिक विवाद अधिनियम में कुछ बुनियादी कमियां हैं। सौ से ज्यादा कर्मचारियों वाली इकाई के लिए कुछ नियम हैं, वहीं दस से ज्यादा, मगर बीस से कम कर्मचारियों वाली इकाई के लिए दूसरे नियम हैं। इतना ही नहीं उद्योगों को भी लघु, सूक्ष्म और मध्यम में वर्गीकृत किया गया है, और ये सभी अलग-अलग नियमों के तहत संचालित होते हैं। ' वह कहते हैं कि अगर सभी कर्मचारी नियमित नौकरी पर हों तो इकाइयों को छोटा रखने और उन्हें उदासीन बनाए रखने में नियोक्ता को कोई फायदा नहीं दिखेगा। अगर नौकरी से निकालने की प्रक्रिया पारदर्शी ढंग से तय की गई हो, तो कर्मचारियों को भी नियत शर्तों को स्वीकार करने में ऐतराज नहीं होना चाहिए। दोनों तरफ के हितों की सुरक्षा के लिए प्रक्रियागत खामियों को दूर करना होगा।
इसके अलावा लेबर नेट जैसी पहल भी काफी उपयोगी साबित हो सकती है। यह एक सामाजिक उपक्रम है, जिसने अनौपचारिक श्रमिकों को प्रशिक्षित करने के लिए राष्ट्रीय कौशल विकास कारपोरेशन के साथ्ा अनुबंध किया हुआ है। गौरतलब है कि अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों की एक बड़ी तादाद अशिक्षित या स्कूल को बीच में छोड़ने वालों की है। इनके पास न तो कोई औपचारिक प्रशिक्षण है, न ही कोई कौशल। इस वजह से कमाई की इनकी क्षमता भी कम रह जाती है। अनौपचारिक क्षेत्र को पूरी तरह औपचारिक जामा पहनाने में तो वक्त लगेगा, मगर इन श्रमिकों के जीवन स्तर को सुधारने में कौशल विकास आज सबसे बड़ी जरूरत बन गई है।