वह अपने इलाके के विकट परिक्रमावादी माने जाते हैं। माना जाता है कि यह गुण उनमें जन्म से ही था, लेकिन जबसे उन्होंने राजनीति में अपनी टांग फंसाई है, तब से परिक्रमा करने के उनके हुनर में ज्यादा निखार आया है। अक्सर जब-जब चुनाव की आहट सुनाई देने लगती है या चुनाव परिणाम घोषित हो जाते हैं, तब-तब उनका मन मयूर परिक्रमा नृत्य करने लगता है। उनकी अपने इलाके में फुल चलती है। कोई उन्हें चैलेंज करे, इससे पहले ही वह परिक्रमा के हथियार से सामने वाले के वार को भोथरा कर डालते हैं।
चुनाव नतीजा आने के बाद कल वह मुझे आलाकमान की परिक्रमा करते बरामद हुए। लगा, जैसे मंत्रिपद सूंघ रहे हों। पिछले दिनों टिकट के लिए भी वह इसी तरह परिक्रमा करते पाए गए थे। मैंने पूछा, गुरुदेव, आखिर इस उमर में आपको आलाकमान की परिक्रमा का ख्याल कैसे आया? उन्होंने मुझे ऐसी हिकारत भरी नजर से देखा, जैसे इन दिनों रुपये को डॉलर देख रहा है। बोले, राजनीति में परिक्रमा एक शाश्वत सत्य है। इसके लिए उमर की कोई सीमा नहीं है। परिक्रमा तो पृथ्वी भी करती है, तभी उसे दिन और रात नसीब है। राजनीति का सूर्य तो आलाकमान ही है। इसलिए अगर अपनी राजनीति का सूर्य चमकाना है, तो आलाकमान की परिक्रमा जरूरी है। उन्होंने परिक्रमा की उपयोगिता पर अपना दर्शन सामने रखा। वास्तव में परिक्रमा का मूल उद्देश्य प्रगति है। आलाकमान चाहे 10, जनपथ में हो या झंडेवालान में, उसकी परिक्रमा राजनीति में करियर की राह खोलती है।
लेकिन गुरुदेव, हमने तो सुना है कि कुछ परिक्रमाएं ऐसी होती हैं, जिनका न होना उनके होने से ज्यादा अहमयित रखता है। जैसे विश्व हिंदू परिषद की पिछले साल वाली चौरासी कोसी परिक्रमा। मैंने उत्सुकतावश पूछ लिया। लेकिन गुरुदेव ने ‘नो कमेंट्स’ कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया। सच है, राजनीति में कोई नियम स्थायी तो होता नहीं। परिक्रमा के लिए भी कोई नियम स्थायी नहीं है।