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पड़ोस: पाकिस्तान एससीओ के बारे में क्या सोचता है.. सबकी नजरें भारत पर टिकी हैं; इस्लामाबाद में होना है सम्मेलन

मरिआना बाबर
Updated Fri, 06 Sep 2024 05:06 AM IST

सार

अगले माह इस्लामाबाद में होने वाले एससीओ सम्मेलन को लेकर सबकी निगाहें सिर्फ इस पर टिकी हैं कि क्या भारत इसमें हिस्सा लेगा?
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एससीओ के सदस्य देशों के प्रतिनिधि। - फोटो : एएनआई / रॉयटर्स


वर्ष 2001 में स्थापित राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी संगठन एससीओ के अनिवार्य शिष्टाचार के तहत सभी सदस्य देशों के प्रमुखों को बैठक में आने के लिए निमंत्रण भेज दिया गया है। रूस, चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और ईरान ने बैठक में शामिल होने के लिए अपनी सहमति भी भेज दी है। लेकिन सबकी नजरें नई दिल्ली पर टिकी हैं।


अब तक भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट नहीं किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन को आभासी ढंग से संबोधित करेंगे या अपना प्रतिनिधि भेजेंगे। एससीओ शासनाध्यक्षों से पहले वरिष्ठ अधिकारियों की एक बैठक होगी, जिसमें विदेश मंत्री भी शामिल होंगे। पिछले वर्ष जब एससीओ की बैठक गोवा में हुई थी, तो उसमें पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी ने हिस्सा लिया था। तो क्या भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस्लामाबाद आएंगे? भारत के शीर्ष नेतृत्व के पाकिस्तान दौरे को लेकर खबरों का बाजार गर्म है। पाकिस्तानी मीडिया मोदी के स्वागत को लेकर उत्साहित है, ताकि लंबे समय से द्विपक्षीय संबंधों पर जमी बर्फ पिघल सके और रिश्तों में गर्माहट आए। लेकिन विश्लेषकों को आशंका है कि भारत की ओर से कोई भी प्रतिनिधि पाकिस्तान नहीं आएगा।


व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी को पाकिस्तान आकर रिश्तों की गर्मजोशी का संदेश देना चाहिए। वह तीसरी बार मुल्क के प्रधानमंत्री बने हैं और अपनी मजबूतइच्छाशक्ति दिखाकर लोगों को आश्चर्यचकित कर सकते हैं। जैसा कि वर्ष 2015 में काबुल से लौटते वक्त वह अचानक लाहौर पहुंचे थे, और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की नातिन की शादी में शरीक हुए थे। मुझे याद है, तब इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायुक्त टीसीए राघवन ने अपनी कार में पेट्रोल भरवाया, लेकिन यह सोचकर कि पांच घंटे गाड़ी चलाकर वह समय पर लाहौर एयरपोर्ट नहीं पहुंच सकते हैं, इसलिए सीधे शरीफ परिवार के पैतृक घर पहुंच गए थे। दुर्भाग्य से मोदी के नई दिल्ली लौटने के कुछ दिन बाद ही दो जनवरी, 2016 को पठानकोट एयरबेस पर पाकिस्तानी आतंकियों ने हमला कर दिया, जिसके बाद रिश्ते खराब हो गए।


हालांकि पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने अभी कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन खबरें हैं कि एससीओ की बैठक में चीन के प्रधानमंत्री आएंगे और एससीओ बैठक से अलग द्विपक्षीय मुलाकात भी करेंगे। एससीओ जैसी बैठकें भारत और पाकिस्तान के लिए इन बैठकों से इतर मिलने का एकमात्र माध्यम हैं, लेकिन दुर्भाग्य से पिछले कई वर्षों से दोनों देशों के बीच कोई द्विपक्षीय वार्ता नहीं हुई है। पिछली बार बिलावल भुट्टो जब गोवा गए भी थे, तब भी उनकी भारतीय विदेश मंत्री के साथ अलग से कोई बैठक नहीं हुई थी, जबकि जयशंकर अन्य एससीओ देशों के विदेश मंत्रियों से बड़ी सहजता से मिले थे। एससीओ बैठक द्विपक्षीय मुद्दों का मंच नहीं है, लेकिन वर्ष 2015 में रूस के उफा शहर में हुए एससीओ सम्मेलन से इतर नवाज शरीफ और नरेंद्र मोदी के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई थी और दोनों ने संयुक्त बयान जारी किया था। असल में एससीओ बैठक हो या दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) सम्मेलन, हमेशा सभी की निगाहें इस पर टिकी होती हैं कि क्या भारत और पाकिस्तान के बीच कोई वार्ता होगी या दोनों देशों के शीर्ष नेता हाथ मिलाएंगे?


याद करें, जब 2002 में काठमांडू में हुए सार्क सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने खड़े होकर भारत के करिश्माई राजनेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पास जाकर हाथ मिलाया था। इस बात की दुनिया भर में सराहना हुई थी और दुनिया ने दोनों पड़ोसी देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को महसूस किया था। भले ही दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व निरंतर जारी तनाव को खत्म नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन मुझे यकीन है कि अगर एक दिन के लिए भी दोनों मुल्कों के लोगों को मौका दिया जाए, तो हजारों लोग सीमा पार कर एक-दूसरे से मिलने के लिए दौड़ पड़ेंगे, क्योंकि दोनों मुल्कों के आम लोगों में एक-दूसरे प्रति काफी सम्मान और दिलचस्पी है।

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