फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

घोटालों के इस देश में

विज्ञापन
विज्ञापन
भारत घोटालों का देश बनकर रह गया है। एक ही दिन मनरेगा पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट, कोयला खदान आवंटन पर संसदीय समिति की रिपोर्ट और पहले से 2 जी पर संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट के लीक अंश तथा सीबीआई द्वारा कोयला खदान आवंटन पर सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल करने के लिए तैयार शपथपत्र।
विज्ञापन


इन सब पर सरकार और विपक्ष की मोर्चेबंदी। भारत दुनिया का संभवतः अकेला ऐसा लोकतांत्रिक देश है, जहां भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं है। जिस मनरेगा को कांग्रेस और संप्रग सरकार ग्रामीण गरीबों के रोजगार का ऐतिहासिक कार्यक्रम साबित करती रही है, उस पर आई कैग की रिपोर्ट बता रही है कि इस योजना के धन का गलत इस्तेमाल तो हुआ ही, योजना की निगरानी के काम में भी जमकर ढिलाई बरती गई।

यह रिपोर्ट इतनी तथ्यपरक है कि सरकार के लिए पूर्व की कैग रिपोर्टों की तरह इस पर प्रश्न खड़ा करना असंभव हो गया है। वास्तव में पहली बार कैग ने 38,374 लाभार्थियों का सर्वेक्षण कर सप्रमाण वस्तुस्थिति दिखाई है। इसके अनुसार, जॉब कार्ड में, मजदूरी भुगतान में, कार्य संपादन में, हिसाब-किताब में यानी हर जगह घपला ही घपला। और सबसे बढ़कर इसके तहत रोजगार तलाशने वालों की संख्या में आई कमी। यानी जिस लक्ष्य के लिए यह योजना आरंभ हुई, उसमें भी लचर प्रदर्शन।
विज्ञापन


किंतु इस भ्रष्टाचार में राज्यों की भी जिम्मेदारी है। उन्हें भी तो देखना है कि श्रमिकों को जॉब कार्ड से लेकर पारिश्रमिक भुगतान हो रहा है या नहीं, तथा जो कार्य कागजों पर दिखाए गए हैं, वे वाकई हुए भी हैं या नहीं। पर हमारी राजनीति ऐसी है कि इसका निदान तलाशने, इसे मिल-जुलकर रोकने का उपाय करने की जगह बस केवल विरोधी पर हमला करो।

केवल मनरेगा ही नहीं, कोयला ब्लॉक आवंटन में भी यही दशा है। कोयला एवं इस्पात संबंधी संसद की स्थायी समिति ने 1993 से 2008 तक हुए सभी आवंटनों को गैरकानूनी करार दिया है। इस दौरान उदारीकरण की तीव्र गति के कारण कोयले के दाम तेजी से बढ़े और लोगों का लालच भी बढ़ा।

इसलिए जहां पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल में केवल पांच, एचडी देवगौड़ा के कार्यकाल में केवल चार एवं अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दरम्यान 32 आवंटन हुए, वहीं मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में 175 खदानों का रिकॉर्ड आवंटन हुआ। जिन्होंने खदान लिए, उन्होंने बगैर खनन किए शेयर बेचकर बिना मेहनत के धन कमाया।

यह हमारे खजाने को तो भयानक चपत है ही, प्राकृतिक संसाधनों की निर्मम लूट भी है। आवंटन से सरकार को राजस्व की प्राप्ति नहीं हुई, पर निजी कंपनियों ने मुनाफा कमाया। 2 जी स्पेक्ट्रम में यही हुआ था। कंपनियों ने लाइसेंस लेकर दूसरी कंपनियों को बेचकर खरबों का मुनाफा कमाया था। यह सब सरकार के सामने, नियामकों की छत्रछाया में हुआ। इस प्रकार देखा जाए, तो संपूर्ण तंत्र इन घपलों में शामिल माना जाना चाहिए।

सरकार से जुड़े या किसी तरह रसूख रखने वालों को अमूल्य प्राकृतिक संसाधन औने-पौने दामों में दे दिया गया और इसमें अपना दोष मानने के बजाय सरकार सीना ताने खड़ी है।

ए. राजा ने जो लंबा पत्र समिति को लिखा, उसका संज्ञान लेने तक की कोशिश नहीं हुई। यह सब एक भ्रष्टाचार से अपनी खाल बचाने के लिए किया गया बड़ा भ्रष्टाचार है। संसदीय लोकतंत्र की शीर्ष इकाई संसद की समिति यदि ऐसा आचरण करती है, तो फिर आप किस इकाई से उम्मीद करेंगे कि वह भ्रष्टाचार का सच सामने लाकर दोषियों को सजा दिलाएगी तथा खजाने को लगी चपत की भरपाई करा देगी।

राजनेता संसद की छवि को कमजोर करने का आरोप मीडिया पर लगाते हैं। उनसे पूछा जाना चाहिए कि संसद की संयुक्त समिति यदि ऐसा आचरण करेगी, तो उससे उसकी छवि दागदार होगी या स्वच्छ। अगर राजनीति के बहुमत का आचरण इस तरह भ्रष्टाचार को ढकने और इसके परिमार्जन के बजाय दोष से बचने और दोषियों को बचाने का होगा, तो फिर राजनीति और राजनेताओं के प्रति सम्मान भाव कहां से पैदा होगा!

इसलिए देश के हर सोचने-समझने वालों को भ्रष्टाचार पर राजनीतिक मोर्चेबंदी से अप्रभावित रहकर इस गंभीर स्थिति पर अवश्य विचार करना चाहिए कि आखिर अपने तंत्र की सफाई कैसे की जाए।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें