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लागा रिमोट में 'कोल' छुड़ाऊं कैसे

Thu, 12 Mar 2015 08:37 PM IST
सूर्यकुमार पांडेय
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अपने मन्नू भाई का रिमोट खिन्न है। हाथ ने आखिरकार उसे कहीं का नहीं छोड़ा। जैसा चाहा, वैसा ही चलाया। परम शांत रिमोट। बेचारा बोलता भी, तो भला क्या बोलता। अखंड मौनव्रत धारण कर वह निष्ठापूर्वक अपनी भूमिका का निर्वहन करता रहा। पांच उंगलियां उसके बटन दबाती रहती थीं। मन्नू भाई के रिमोट को आनंद की अनुभूति होती। उन्हें लगता, जैसे उनके शरीर का एक्युपंचर हो रहा है।
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अब जबकि सेल्स कमजोर पड़ गई हैं, रिमोट अतिशय पीड़ा का अनुभव कर रहा है। जीवन में ऐसे क्षण भी आते हैं। शरीर कमजोर पड़ जाए, तो रोग भी हमला करने से नहीं चूकते। सबकी प्रतिरोधक क्षमता समान नहीं होती। मनुष्य मात्र तक जरा-जरा-सी बात पर तनाव में आ जाते हैं।

हर कोई वैसा तो नहीं होता न कि आज गुदगुदाओ, तो वह चार दिन बाद हंसेगा। बहरहाल, वह तो रिमोट है। एक लघु यंत्र। दूसरे के हाथों का खिलौना। परचालित। 'प्ले' किया, तो काम करने लग गया। 'म्यूट' कर दिया, तो शांति स्थापित कर दी। हालांकि उसकी देह पर 'मेनू' और 'गाइड' सब अंकित हैं, लेकिन न उसका स्वयं का कोई मेनू होता है, न ही अपना कोई गाइडेंस। रिमोट की नियति ही होती है स्वामी के हाथों की कठपुतली बने रहना। न अपने 'वॉल्यूम' पर उसका अधिकार होता है, न ही अपने 'होम' और 'स्लीप' वाले ऑप्शन्स पर।
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एक पुरानी कहावत है- करे कोई और भरे कोई। दरअसल हर रिमोट की यही गति होती है। उसकी देह पर दाग लगते ही लगते हैं। काजल की कोठरी और कोयले की दलाली से आज तक कौन पाक-साफ निकल सका है भला? ऐसे दिन भी आएंगे, मन्नू भाई के रिमोट ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। वह मन्ना डे को याद कर रहा है-'लागा रिमोट में कोल, छुड़ाऊं कैसे?' सबसे पूछ रहा है, कि आखिर मैंने क्या गलत किया? मैं तो कुछ बोला भी नहीं।

तो आज 'कोल' का किलोल जारी है। 'मन्नू' का 'मेनू' मतिभ्रमित है। कुछ कमजोर हाथ उसे सांत्वना दे रहे हैं। रिमोट पूर्ववत मौन है। बस, तमाशा-ए-अहले-करम देख रहा है।
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