एक सज्जन ने पिछले दिनों मुलाकात के दौरान अपना परिचय देते हुए कहा, जी, मैं अपने एनजीओ के माध्यम से सेवा कार्य में लगा हुआ हूं। फिर अपनी बात और खोलते हुए वह बोले, हम बेजुबान पशु-पक्षियों के लिए काम करते हैं। इंसान के लिए आर्थिक सहायता और अनुदान दे-देकर तो पश्चिमी देशों के धनकुबेर थक गए हैं। पर पशु-पक्षियों के मामले में अभी बहुत गुंजाइश बची हुई है। इनके नाम से जितना अनुदान मिल सकता है, अभी तो उसके दस प्रतिशत की भी उगाही नहीं हुई है।
मेरे चेहरे पर चौंकने के भाव देखकर वह दोगुने उत्साह के साथ शुरू हो गए, हमारा एनजीओ पशु-पक्षियों के मानसिक रोगों का इलाज कराता है। पिछले दिनों मौसम ने अजीब कलाबाजियां दिखाई हैं। पर्यावरण जो है, वह मंत्रिपद से भ्रष्टाचार के आरोप में हटा दिए गए नेता की तरह बावला हो रहा है। बेमौसम बरसात ने पशु-पक्षियों को कनफ्यूज कर दिया है। जिन मेंढकों को गहरी नींद में मग्न होना चाहिए था, वे यहां-वहां फुदकते हुए जोर-जोर से टर्रा रहे हैं।
पपीहा बेवक्त पी कहां पी कहां की रट लगाए हुए है। कोयल समय से चार महीने पहले ही अंडे देने के लिए कौओं के घोंसले तलाश रही है। जबकि कौए हैं कि असमय भारी बरसात के कारण राजभवनों से बेदखल राज्यपालों की तरह बिना घोंसलों के घूम रहे हैं। हरियाली से अपना रंग मैच कराने के चक्कर में गिरगिट अपना रंग बदलना भूल रहे हैं। ऋतुचक्र के इस अचानक परिवर्तन से मेंढकों, कोयलों, कौओं आदि को घोर मानसिक संताप पहुंचा है।
पर यह आपको कैसे पता, क्या आप इनकी बोली समझते हैं? मैंने उनसे पूछा। वह किसी दार्शनिक की तरह बोले, जी, पक्षियों की परेशानी समझने के लिए उनकी बोली समझने की जरूरत नहीं, संवेदना ही काफी है।
मैंने चलते-चलते हुए उन्हें हाथ जोड़े, तो वह बोले, मेरा कार्ड रख लीजिए। मौसम की मार से पगलाए कौए रात में उड़ते मिलें या जलवायु परिवर्तन के कारण अपनी दिनचर्या बदलकर उल्लू दिन में मंडराते हुए दिखें, तो हमें सूचित करें।