सरकार और विपक्ष में चूहे-बिल्ली का खेल चलता रहता है। यकीनन सरकार तो बिल्ली ही रहती है। विपक्षी दल ने घोषणा कर दी कि मंत्री का पुतला जलाया जाएगा। विरोधी दल को उम्मीद थी कि ऐसा करते हुए खूब छीना-झपटी होगी। पुलिस पूरी कोशिश करेगी कि पुतला नहीं जलाने दिया जाए। इसमें अगर कोई आम आदमी जिंदा जल जाए, तो पुलिस को कोई फर्क नहीं पड़ता, मगर नेता का पुतला जल जाए, तो उसे अपनी कार्यक्षमता पर शर्म आने लगती है। जलाने वाले भी बताते हैं कि खेत में जलाएंगे और जलाने पहुंच जाते हैं खलिहान में। पुलिस पूरे समय हैरान रहती है कि पुतला किस तरफ ले जाया गया है।
पुतला वैसे तो छिपाकर ले जाया जाता है, पर बनाने वाला भी पुलिस का मुखबिर ही होता है, तो यह बता देता है कि किस तरफ निकले हैं पुतला-दहन करने वाले। पुतला देखकर आप अंदाज नहीं लगा सकते कि यह किसका है। अगर विरोधी दल कह रहा होता है कि मंत्री का है, तो पुलिस के पास भी यह मानने के अलावा कोई चारा (वैसे पुतला भी चारा यानी घास का ही बनता है) नहीं रहता कि कह रहे हैं, तो मंत्री का ही होगा। अगर मंत्री खुद पुतले को देख ले, तो अपने ही लोगों से कह दे कि आग लगा दो इसे। क्या मैं ऐसा नजर आता हूं! पुलिस और दहन वीरों के बीच लुकाछिपी चलती है और कभी पुतला बचा लिया जाता है, तो कभी विरोधी दल के लोग गिरफ्तार कर लिए जाते हैं।
अभी तक पुतला दहन की यही मान्य प्रक्रिया रही है, पर मान लीजिए, कभी सरकार ने पुलिस से कह दिया कि कोई यदि पुतला जला भी रहा है, तो जलाने दें, तो क्या होगा! विपक्षी दल पर तो जैसे कुठाराघात हो जाएगा। भला यह भी कोई बात हुई कि पुतला जलाने दो। रोकोगे नहीं, तो पुतला जलाने का क्या मतलब? पुतला कोई हाथ तापने या रोटी सेंकने के लिए तो जला नहीं रहे। आदत ही नहीं रही कभी यों शांतिपूर्वक पुतला जलाने की। रोका नहीं जाए, तो जलाने कौन आएगा! विरोधी दल गुस्से में है और सत्ता पक्ष पर आरोप लगा रहा है कि वह प्रजातंत्र का गला घोंट रहा है। यह विपक्षी दलों को अकर्मण्य बनाने की साजिश है। यदि पुतला जलाते हुए पुलिस ने हमें नहीं पकड़ा, तो हम सरकार की ईंट से ईंट बजा देंगे, संसद ठप कर देंगे। लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखने के लिए पुतले का जलना जितना जरूरी है, उससे ज्यादा जरूरी है पुतले को न जलने देना।