हद हो गई! हमें कहते हो कि हम बकना छोड़ दें? मछली जल के बिना जीवित रह सकती है, पर हम बके बिना नहीं। हमारे प्राण शरीर में नहीं, जुबान में निवास करते हैं। हम कुछ भी बकने का जन्मसिद्ध अधिकार लेकर इस देश में पैदा हुए हैं। जिस तरह से भ्रष्टाचार करना भ्रष्टाचारियों का जन्मसिद्ध अधिकार है, उसी तरह से बकना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।
हम बकते हैं, तो अखबार छपते हैं! हम बकते हैं, तो टीवी वाले टीवी चलाते हैं! अगर हम बकना बंद कर दें, तो दूसरे दिन अखबार छपने बंद हो जाएं, टीवी वालों के पास अपने दर्शकों को हमारे पुराने टेपों को बजाने के सिवाय और कुछ भी न होगा। देखो जी! हम जनता तो हैं नहीं कि सारा दिन हाड़-मांस तोड़ने के बाद भी दो जून की रोटी तक न नसीब हो। हमने मेहनत की तो आज तक खाई नहीं, तो आज क्यों खाए? अगर एक भी हमारे टोले का मेहनत कर खाने वाला मिल जाए, तो बकबकी करना छोड़ दूं।
देखो साहब, आप अच्छा मानो या बुरा! लोकतंत्र की असीम कृपा से हमने तो आज तक बकने की ही खाई है, और डटकर खाई है। और अब आप कहते हो कि हम बकना छोड़ दें? आपको अगर हमारा बकना गंवारा नहीं, तो साहब कोई बात नहीं। निकाल दो हमें पार्टी से। हम पार्टी के बिना रह सकते हैं, पर बिन बके नहीं। जब हम बकते हैं, तो बस बकते हैं। और जब हम बकते हैं, तो यह हमें भी पता नहीं होता कि हम क्या बक रहे हैं। अगर ये होने के बाद भी तोलकर बका तो क्या बका? अरे वह तो वह होता है, जो बिन तोले बकता है।
सर जी! जिस तरह फिक्सिंग का धर्म फिक्सिंग है, लाला का धर्म चावल में कंकड़ मीक्सिंग है, बिल्ली का धर्म तराजू के दोनों पलड़ों में से खाना है, उसी तरह हमारा धर्म भी बकियाना है। हमने अपने बयानों पर न कभी दुख जताया है, न कभी जताएंगे। जो ये कहते हैं कि हमने अपने बके पर दुख जताया है, वे गलत बक रहे हैं। हम तो बकबक कर अपने धर्म का पालन करते हैं बस! हम चाहे सेक्यूलर हों, चाहे नॉन सेक्यूलर, हमें अपने धर्म से कोई अलग नहीं कर सकता। इस देश में किसी को कुछ भी करने से रोका जा सकता है, पर बकने से नहीं। देखो तो, जिन लोगों के पेट में हफ्तों से रोटी का कौर भी नहीं गया, वे भी सारे काम छोड़ कितने दम-खम से बके जा रहे हैं। ऐसे में हम क्यों रुकें? हमारी सेहत अलाऊ करे, तो हम सोए-सोए भी बकते रहें।