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मुस्लिम विरोधी नहीं राष्ट्रवादी थे पटेल

प्रदीप कुमार
Updated Sun, 24 Nov 2019 07:00 AM IST
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आजादी की लड़ाई के दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल की छवि एक मुस्लिम विरोधी की बनाई गई। यह गलत छवि उनके प्रति आकर्षण का एक बड़ा कारण भी बनी। कुछ दिन पहले सरदार की पुण्यतिथि के अवसर पर भी इसका आभास कराया गया। सरदार अगर मुस्लिम विरोधी होते, तो वह महात्मा गांधी के प्रिय शिष्य न बन पाते। नेहरू और पटेल के बीच कई विषयों पर गंभीर मतभेद थे और दोनों के इस्तीफा देने की भी नौबत आई। पर मुस्लिम मुद्दा इसमें नहीं था।

खुद पटेल अपने बारे में क्या सोचते थे? राजमोहन गांधी ने अपनी किताब पटेल : अ लाइफ में लिखा है कि कमांडर इन चीफ रॉय बुचर स्वतंत्रता दिवस के ढाई महीने पहले 31 मई को देहरादून में उनसे मिले थे। पटेल ने उनसे कहा, ' मैं कुछ मसलों के बारे में आपको बताना चाहता हूं।... बहुत सारे लोग समझते हैं कि मैं मुस्लिम विरोधी हूं। यह बात बिल्कुल नहीं है। मैं पूरे भारत में मुसलमानों की सलामती और भले की गारंटी करने को तैयार हूं।' 



राजनीतिक लाभ की दृष्टि से वांछित निष्कर्ष निकालने के लिए इस तथ्य की प्रायः अनदेखी कर दी जाती है कि संविधान सभा की अल्पसंख्यक विषयक सलाहकार समिति के अध्यक्ष पटेल ही थे। संविधान ने अल्पसंख्यकों की भाषा, लिपि, संस्कृति की रक्षा की गारंटी दी।

अल्पसंख्यकों से संबंधित संविधान के अनुच्छेदों 25, 26, 27, 28, 29 और 30 के अस्तित्व का बड़ा श्रेय तो पटेल को ही दिया जाएगा। जब पाकिस्तान से जिंदा- मृत हिंदुओं और सिखों की गाड़ियों का तांता लगा हुआ था और इधर से लाखों मुसलमान पाकिस्तान जा रहे थे, तब गृह मंत्री पटेल ही थे।

दिल्ली में भी मारकाट मची हुई थी। पटेल ने नेहरू और माउंटबेटन के साथ बैठक में कहा था, 'दिल्ली लाहौर बन जाए, यह मैं कतई बर्दाश्त नहीं करूंगा।' पटेल ने सीधे गोली मार देने का आदेश जारी कर दिया। उसी दिन पुरानी दिल्ली स्टेशन पर चार हिंदू दंगाइयों को गोली मार दी गई। 

पटेल को मुस्लिम विरोधी साबित करने के लिए अमृतसर और लखनऊ के उनके भाषणों का हवाला दिया जाता रहा है। पटेल ने अमृतसर में कहा था, मैं आपसे एक अपील करने आया हूं। शहर छोड़कर जा रहे मुसलमानों की हिफाजत का वचन दें। अगर कोई बाधा डालेंगे, तो हमारे शरणार्थियों की हालत दुखद हो जाएगी।
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लियाकत अली खान ने नेहरू को फोन कर चिंता जताई। गांधी जी से शिकायत की गई कि पटेल मुसलमानों के पाकिस्तान जाने के विचार को प्रोत्साहित कर रहे हैं। पटेल ने गांधी जी से कहा, 'जिन मुसलमानों की निष्ठा भारत के प्रति नहीं है, उन्हें चले जाना चाहिए। और मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि मुसलमानों का बहुमत निष्ठावान नहीं है।'

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आजादी की लड़ाई के दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल की छवि एक मुस्लिम विरोधी की बनाई गई। यह गलत छवि उनके प्रति आकर्षण का एक बड़ा कारण भी बनी। कुछ दिन पहले सरदार की पुण्यतिथि के अवसर पर भी इसका आभास कराया गया। सरदार अगर मुस्लिम विरोधी होते, तो वह महात्मा गांधी के प्रिय शिष्य न बन पाते। नेहरू और पटेल के बीच कई विषयों पर गंभीर मतभेद थे और दोनों के इस्तीफा देने की भी नौबत आई। पर मुस्लिम मुद्दा इसमें नहीं था।

खुद पटेल अपने बारे में क्या सोचते थे? राजमोहन गांधी ने अपनी किताब पटेल : अ लाइफ में लिखा है कि कमांडर इन चीफ रॉय बुचर स्वतंत्रता दिवस के ढाई महीने पहले 31 मई को देहरादून में उनसे मिले थे। पटेल ने उनसे कहा, ' मैं कुछ मसलों के बारे में आपको बताना चाहता हूं।... बहुत सारे लोग समझते हैं कि मैं मुस्लिम विरोधी हूं। यह बात बिल्कुल नहीं है। मैं पूरे भारत में मुसलमानों की सलामती और भले की गारंटी करने को तैयार हूं।' 

राजनीतिक लाभ की दृष्टि से वांछित निष्कर्ष निकालने के लिए इस तथ्य की प्रायः अनदेखी कर दी जाती है कि संविधान सभा की अल्पसंख्यक विषयक सलाहकार समिति के अध्यक्ष पटेल ही थे। संविधान ने अल्पसंख्यकों की भाषा, लिपि, संस्कृति की रक्षा की गारंटी दी।

अल्पसंख्यकों से संबंधित संविधान के अनुच्छेदों 25, 26, 27, 28, 29 और 30 के अस्तित्व का बड़ा श्रेय तो पटेल को ही दिया जाएगा। जब पाकिस्तान से जिंदा- मृत हिंदुओं और सिखों की गाड़ियों का तांता लगा हुआ था और इधर से लाखों मुसलमान पाकिस्तान जा रहे थे, तब गृह मंत्री पटेल ही थे।

दिल्ली में भी मारकाट मची हुई थी। पटेल ने नेहरू और माउंटबेटन के साथ बैठक में कहा था, 'दिल्ली लाहौर बन जाए, यह मैं कतई बर्दाश्त नहीं करूंगा।' पटेल ने सीधे गोली मार देने का आदेश जारी कर दिया। उसी दिन पुरानी दिल्ली स्टेशन पर चार हिंदू दंगाइयों को गोली मार दी गई। 

पटेल को मुस्लिम विरोधी साबित करने के लिए अमृतसर और लखनऊ के उनके भाषणों का हवाला दिया जाता रहा है। पटेल ने अमृतसर में कहा था, मैं आपसे एक अपील करने आया हूं। शहर छोड़कर जा रहे मुसलमानों की हिफाजत का वचन दें। अगर कोई बाधा डालेंगे, तो हमारे शरणार्थियों की हालत दुखद हो जाएगी।

लियाकत अली खान ने नेहरू को फोन कर चिंता जताई। गांधी जी से शिकायत की गई कि पटेल मुसलमानों के पाकिस्तान जाने के विचार को प्रोत्साहित कर रहे हैं। पटेल ने गांधी जी से कहा, 'जिन मुसलमानों की निष्ठा भारत के प्रति नहीं है, उन्हें चले जाना चाहिए। और मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि मुसलमानों का बहुमत निष्ठावान नहीं है।'

छह जनवरी, 1948 को लखनऊ में उन्होंने कहा,  'मैं मुसलमानों का सच्चा दोस्त हूं, फिर भी मुझे उनका सबसे बड़ा दुश्मन बताया जाता है। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि भारत के प्रति निष्ठा की महज घोषणा से बात नहीं बनेगी। उन्हें अपनी निष्ठा का व्यावहारिक सुबूत भी देना होगा। इसी लखनऊ में दो राष्ट्रों के सिद्धांत की नींव रखी गई थी। इस सिद्धांत को फैलाने में शहर के मुसलमानों का भी योगदान रहा है। मैं भारत के मुसलमानों से एक सवाल पूछना चाहता हूं।

हाल में हुई ऑल इंडिया मुस्लिम कॉन्फ्रेंस में कश्मीर पर कोई कुछ क्यों नहीं बोला? मैं दो टूक बता देना चाहता हूं कि आप दो घोड़ों की सवारी नहीं कर सकते। जो पाकिस्तान जाना चाहते हैं, वे चले जाएं और शांति से रहें। हमें यहां शांति से रहने दें।' यह एक मुस्लिम विरोधी की भाषा है या मुसलमानों के सच्चे दोस्त की?  लोग सुविधानुसार निष्कर्ष निकाल सकते हैं। सही निष्कर्ष निकालने के लिए तत्कालीन परिस्थितियों को याद करना होगा।

अल्लामा इकबाल से लेकर मोहम्मद अली जिन्ना ने अलग मुस्लिम राज्य के लिए सिविल वार तक की चेतावनी दी थी। कोलकाता के कुख्यात डायरेक्ट ऐक्शन से पहले जिन्ना ने धमकी दी थी, ' हमने भी पिस्टल ढाल ली है।' यह कड़वा सच पटेल को लगातार कचोट रहा था कि जहां पाकिस्तान बना, वहां के मुसलमान मुस्लिम लीग के साथ नहीं थे और जिन-जिन क्षेत्रों में पाकिस्तान की लड़ाई लड़ी गई, वे सभी भारत में रह गए। पटेल ने यह सवाल मौलाना आजाद से भी किया था, आप अपनी कौम को अपने साथ क्यों नहीं ला पाए?        

पटेल के अमृतसर और लखनऊ भाषणों की तरह नेहरू का अलीगढ़ भाषण भी ऐतिहासिक है। दोनों लगभग समान रूप से दुविधाग्रस्त थे। असंदिग्ध धर्मनिरपेक्ष समाजवादी नेहरू ने 24 जनवरी, 1948 को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (जिसे पाकिस्तान की नर्सरी माना जाता था) के दीक्षांत समारोह में कहा, मुझे अपनी विरासत और पूर्वजों पर नाज है, जिन्होंने भारत को सांस्कृतिक और बौद्धिक महानता प्रदान की।

आप इस बारे में क्या महसूस करते हैं? आप अपने को हिस्सेदार मानते हैं? आपको फख्र है कि यह सब आपका भी है? या इससे अलग अपने को मानते हैं? मैं यह सवाल इसलिए कर रहा हूं कि हाल के वर्षों में कई ताकतों ने सक्रिय होकर लोगों के दिमाग को गलत चैनल की ओर मोड़ दिया। हम सबका दिमाग साफ होना चाहिए : हम अनिवार्यतः सेक्यूलर राज्य में यकीन  करते हैं,जहां सभी धर्मों और विचारों के लिए स्थान होता है या धर्म-आधारित राज्य में?'

नेहरू और पटेल एक ही संशय से ग्रस्त थे। वे महसूस कर रहे थे कि व्यापक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की स्थितियों में धर्मनिरपेक्ष राज्य का निर्माण आसान नहीं था।  नेहरू के पास भाषा का लालित्य था। ग्रामीण संस्कृति में ढले पटेल खरी बात करते थे। लेकिन वह मुस्लिम विरोधी नहीं थे। आत्मा से धर्मनिरपेक्ष संविधान बनाने में पटेल का स्वर्णिम योगदान था। नेहरू के साथ पटेल न होते, तो आज भारत को हम जिस रूप में देख रहे हैं, वह शायद न होता।
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