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जवानी की एक गलती की सजा

Mon, 01 Apr 2013 03:17 PM IST
तवलीन सिंह
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जब से संजय दत्त को 1993 के मुंबई धमाके मामले में आर्म्स ऐक्ट के तहत पांच साल की सजा हुई है, मुझे रोज कोई न कोई पूछने आता है इस सजा के बारे में। कुछ लोग इसलिए पूछते हैं, क्योंकि उनको याद है मेरा एक लेख, जो मैंने मुंबई धमाकों के बाद लिखा था, जब संजय दत्त पहली बार पकड़े गए थे।
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उसमें मैंने संजय दत्त के साथ हमदर्दी जताई थी। हुआ यह था कि मैं उनकी एक दोस्त और मुंहबोली बहन, मशहूर फोटोग्राफर दयानिता सिंह, को अच्छी तरह जानती थी, और दयानिता ने मुझे यह विश्वास दिलाया था कि संजय दत्त आतंकवादी नहीं, सिर्फ एक सिरफिरा नौजवान था, जिसको बंदूकें जरूरत से ज्यादा पसंद थीं।

ऊपर से मुझे संजय दत्त में आतंकवादियों का स्वभाव बिल्कुल नहीं दिखता, न तब, न अब। पंजाब और कश्मीर में जब दहशत का दौर शिखर पर था, तब मेरी मुलाकात कई आतंकवादियों से हुई थी, सो मैं आतंकवादियों को पहचानती हूं।
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संजय दत्त के स्वभाव में वह कट्टरपन, वह कड़वाहट और वह नफरत बिल्कुल नहीं दिखाई देती, जो आतंकवादियों में साफ दिखती है। दोष सिर्फ उनका इतना था कि उन्होंने गलत लोगों से वास्ता रखा और उनसे एक एके-56 राइफल खरीदी, जिसको मुंबई धमाकों के बाद उन्होंने नष्ट करवाया अपने एक साथी द्वारा।

अगर मुझे यकीन होता कि संजय जानते थे कि उनके दोस्त मुंबई में बम रखने की साजिश रच रहे थे, तो मैं सबसे आगे होती उनको दंडित करवाने में।

मेरा यह मानना है कि संजय दत्त के साथ आज वही हो रहा है, जो भारत में अक्सर होता है उन नागरिकों के साथ, जो आसानी से पकड़ लिए जाते हैं। सोचिए जरा कि इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि आज तक हम उस टाइगर मेमन को दंडित नहीं कर पाए हैं, जिसने मुंबई में धमाकों की पूरी साजिश रची थी। और न ही हमारी सरकार आज तक यह साबित कर पाई है कि उस साजिश के पीछे था पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ।

बावजूद इसके कि यह साबित करना बिल्कुल मुश्किल नहीं है, क्योंकि जनरल हमीद गुल, जो उस वक्त आईएसआई के मुखिया थे, बड़े गर्व से स्वीकार करते हैं कि उन्होंने मुंबई धमाकों की समूची साजिश रची थी। यह बात उन्होंने मुझे खुद बताई, जब 2007 में मैं रावलपिंडी में उनका इंटरव्यू करने गई थी। सच बात तो यह है कि मुंबई के धमाकों को जनरल साहब आईएसआई की एक बड़ी उपलब्धि मानते रहे हैं।

लेकिन हमारी सरकारें चुप्पी साधे पड़ी रहीं। सो दंडित हो रहे हैं प्यादे और आजाद फिर रहे हैं सरगना। यह कैसा न्याय है, जिसको बीस वर्ष लगे हैं पूरा होने में! भारतीय न्याय प्रणाली की समस्याएं इतनी गंभीर हैं कि विशेषज्ञों का मानना है कि इनको हल करने के लिए संसद का एक विशेष सत्र बुलाना पड़ेगा।

सच्चाई यह है कि देश की अदालतों में वर्षों से मामले लंबित पड़े हैं। निचली अदालतों में कई किस्म की समस्याएं हैं। सोचिए जरा कि कंप्यूटर और वीडियो के इस जमाने में देश की अदालतों में आज भी टाइपराइटर पर बयान लिखे जाते हैं।

न्यायाधीशों को कई वर्ष लग जाते हैं अपने फैसले तैयार करने में। अनेक लोग बगैर सुनवाई के वर्षों तक हिरासत में रहते हैं। कई अन्य कारण हैं, जिनकी वजह से न्याय की रफ्तार भारत में सुस्त चाल चलती है और इसका परिणाम साफ दिखता है उन जंगलों में, जहां हथियारबंद नौजवान नक्सली बनकर घूमते हैं, और कश्मीर व पूर्वोत्तर के राज्यों में, जहां वे उग्रवादी बनकर घूमते हैं।

रही बात संजय दत्त की, तो मैं यह अर्ज करती हूं कि उनके जेल जाने से न तो आतंकवादियों के हौसले कम होंगे और न ही वास्तव में न्याय होगा। वह बीस वर्षों से भुगत रहे हैं जवानी की एक गलती की सजा, यह काफी नहीं है क्या?

हमारी सरकार में अगर सचमुच इच्छाशक्ति है आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने की, तो वह दाऊद इब्राहिम और टाइगर मेमन को पकड़ कर पेश करें अदालतों में या उनको उस तरह दंडित करके दिखाएं, जिस तरह इस्राइल करता है अपने दुश्मनों के साथ। या जैसे अमेरिका इन दिनों कर रहा है अपने दुश्मनों के साथ ड्रोन हमलों के जरिये। इसके बगैर कोई भी कदम असरदार नहीं होगा।
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