यह देखना अद्भुत है कि वन और वन्यजीवों के विकास के नाम पर धीरे-धीरे गांवों और ग्रामीणों को हाशिये पर डाल दिया जा रहा है। यह आखिर कैसी सोच है, जो एक की कीमत पर दूसरे के विकास का सपना देखती है! हमें जंगल भी चाहिए और गांव भी। लेकिन सरकारों की सोच से तो यही लगता है कि वन्यजीवों को बचाने के नाम पर वे गांवों को तबाह करने से पीछे नहीं हटेंगी।
वन्यजीवों की चिंता का एकमात्र विकल्प जब सरकारों को पार्क या अभयारण्य के रूप में दिखाई दिया, तब सरकार ने ताबड़तोड़ देश में जगह-जगह इन्हें खड़ा कर दिया। देश का पहला पार्क कार्बेट नेशनल 1936 में बना और उसके बाद इनकी ऐसी बाढ़ आई कि आज देश में छोटे-बड़े सैकड़ों पार्क हैं। अब इन पार्कों में वन्यजीव कितने सुरक्षित हैं या ढंग से सांस ले पा रहे हैं, यह अलग बात है।
सरकार ने तो अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह निभाई! अब पर्यावरण विभाग ने एक बार फिर आदेश जारी कर सभी राज्य सरकारों से विनती की है कि जितने भी पार्क और अभयारण्य हैं, उनके 10 किलोमीटर के दायरे को किसी भी तरह की मानवीय गतिविधि से मुक्त रखा जाए। वन्यजीवों को बचाने के लिए गांवों का हुक्का-पानी बंद करने का यह तुगलकी फरमान हमारे यहां नया नहीं है। तो क्या यह मान लिया जाए कि सरकार के पास पर्यावरण संरक्षण का कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
न्यायपालिका की चिंता अपनी जगह उचित है कि देश में पर्यावरण के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता को नियम-कानूनों के रास्ते पर लाया जा सकता है। पर न्यायपालिका का सहारा लेने वाले संगठनों को चाहिए कि वे जमीनी सच्चाई से वाकिफ हों, ताकि सामूहिक हितों की रक्षा हो सके। पहाड़ी राज्य पहले ही अपने वनों के एक बड़े हिस्से के लिए वन अधिनियम के पालन से बंधे हैं। अकेले उत्तराखंड में 21 प्रतिशत भू-भाग पार्कों को आवंटित हो चुका है, जो अन्य मैदानी राज्यों की तुलना में पांच गुना है। इको-सेंसेटिव जोन के नाम पर फिर एक बड़ा हिस्सा लील लिया गया, तो गांवों की तो जीवन-लीला ही खत्म हुई।
वन्यजीवों को बचाने के लिए पार्कों की योजना शुरुआती दौर से ही विवादों में रही है। अब फिर पार्कों व वन्यजीवों की चिंता से जुड़े संगठनों द्वारा सुरक्षा के कई कवचों की आवश्यकता महसूस की जा रही है। ये संगठन न्यायपालिका का दरवाजा खटखटा कर वनवासियों के साथ लगातार अन्याय पर उतारू हैं, क्योंकि वे न तो गांवों का हिस्सा हैं और न ही गांवों की चिंता से परिचित हैं। इसलिए दूर बैठकर फैशन के तौर पर वन और वन्यजीवों की रक्षा का बीड़ा उठाने का दायित्च महसूस करना उनके लिए आसान है।
पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमारे नीतिकारों की समझ वस्तुतः हमेशा कमजोर रही है। उन्होंने उन गांवों को ही वन्यजीवों के विरोध में खड़ा कर दिया, जो पर्यावरण के सच्चे रक्षक रहे हैं। सरकार को तब पर्यावरण संरक्षण की चिंता क्यों नहीं सताती, जब वह बांधों का निर्माण या खनन कार्य से जुड़े फैसले लेती है? पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी गांवों पर ही क्यों? पर्यावरण जब भी बिगड़ा है, वह शहरों की अंधाधुंध बढ़ती आवश्यकताओं के दबाव में बिगड़ा है।
जिन गांवों को बांध के नाम पर बलि चढ़ाया जाता है, वहां तो अक्सर बिजली आती ही नहीं है। बल्कि बांध निर्माण से गांवों के हिस्सों में विनाश ही आता है, जबकि लाभ मूलतः शहरों को ही जाता है। खनन में गांवों को ही विस्थापित किया जाता है, जबकि लाभ कोई और उठाता है। नतीजतन ग्रामीण भारत में एक किस्म का रोष देखा जा सकता है।
पार्क और अभयारण्य बनाने के पीछे सोच यह थी कि वन्यजीवों के लिए सुरक्षित स्थान रखा जाए। लेकिन वन्यजीवों के लिए गांवों को कुर्बान करने की प्रवृत्ति का नतीजा यह है कि गांव के लोग आज पार्कों और अभयारण्यों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं। वनों से गांवों के हमेशा प्राकृतिक संबंध रहे हैं। लेकिन आधुनिक दौर में पहले पार्क बनाकर गांवों को उनके अधिकारों से बेदखल किया गया, और अब पार्कों को सुरक्षित रखने के लिए गांवों को इसके 10 किलोमीटर के दायरे से बाहर खदेड़ा जा रहा है। हम किसकी सुरक्षा करना चाहते हैं और किसकी कीमत पर?
यह तो ऐसा है कि अगर घर को साफ रखना है, तो घर में ही मत रहो। फिर घर का मतलब ही क्या रहा? सरकारों को यह साफ समझ लेना चाहिए कि दिल्ली या राज्य की राजधानियों में बैठकर पर्यावरण को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। या तो वे भी अपनी फाइलों से बाहर आकर वास्तविकता की समझ पैदा करें या फिर देश के पर्यावरण व वन्यजीवों की चिंता गांवों पर ही छोड़ दें।
यह सच सामने आना चाहिए कि आजादी के बाद कितने वनों व वन्यजीवों को संरक्षित करने में सरकार सफल रही? कितनी नदियों को इसने बचाकर रखा? आनेवाली पीढ़ियों के लिए उसने कितनी हवा-मिट्टी सुरक्षित छोड़ी? इनके जवाब आसान नहीं हैं, क्योंकि जब-जब ऐसे प्रश्न खड़े हुए, तो एक के बाद एक नियम बनाकर इनसे बचने के रास्ते तैयार किए गए, जिसकी सीधी चोट गांवों पर पड़ी।
इसलिए गांवों की सीमा को पार्कों और अभयारण्यों से दस किलोमीटर दूर रखने का फरमान गांवों के लिए काले कानून से कम नहीं होगा। लिहाजा सरकारें संतुलित विकास के लिए गांव और अभयारण्य, दोनों को बचाने के बारे में जितनी जल्दी सोच लें, उतना ही अच्छा होगा। वैसे भी ग्रामीण भारत को उदारीकरण से ज्यादातर नुकसान ही हुए हैं। अब यह कहां का न्याय है कि पर्यावरण के नाम पर भी बार-बार उन्हें ही उजाड़ा जाए!