सचिन तेंदुलकर के मुरीद बेशुमार हैं। उनकी कामयाबियों की दास्तां ऐसी कि किसी को भी रश्क हो सकता है। नित नई सफलताओं ने उन्हें क्रिकेट का कुंदन बनाया। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में करीब ढाई दशक का बेदाग और सुनहरा सफर। वह क्रिकेट में रेकॉर्डों का पर्याय बन गए हैं। भद्रजनों के इस खेल में सचिन जैसा भद्रजन शायद ही कोई दूसरा हो। ब्रायन लारा, रिकी पॉन्टिंग, इंजमाम उल हक जैसे सचिन के समकालीन उनसे उन्नीस ही नजर आए।
सचिन ट्वंटी-20 और वन-डे को पहले ही अलविदा कह चुके हैं। अब वेस्ट इंडीज के खिलाफ 14 नवंबर से मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में शुरू होने वाले अपने करियर के 200वें टेस्ट से टेस्ट क्रिकेट को भी ‘बस’ कह देंगे। यानी वह अपना स्वर्णिम बल्ला आखिर टांग देंगे।
इसके साथ भारतीय क्रिकेट के फैब फोर में -सौरभ गांगुली, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण के साथ आखिरी स्तंभ भी क्रिकेट प्रेमियों से जुदा हो जाएगा। सचिन की अगुवाई में भारतीय क्रिकेट को विदेशी धरती पर जीत की आदत डालने में फैब फोर का योगदान सबसे ज्यादा है। सचिन और द्रविड़ के कमाल से ही टीम इंडिया टेस्ट मैच की एक पारी में बराबर 400 रन के पार पहुंचने में कामयाब रही।
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सचिन ने अपना सफर मात्र 16 बरस में भारत के चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ 15 नवंबर, 1989 में कराची टेस्ट मैच से शुरू किया। उसके बाद क्रिकेट की बुलंदियां चूमते चले गए। एक के बाद एक नायाब कामयाबी। उनके मुरीदों में क्रिकेट के सर्वकालीन महान सर डॉन ब्रैडमैन तक शामिल रहे। ब्रैडमैन ने कहा था कि उन्हें इस लड़के (सचिन) में अपना अक्स दिखता है।
सचिन ने क्रिकेट का ककहरा जरूर रमाकांत आचरेकर से सीखा, लेकिन सुनील गावस्कर ने भी बराबर अपने इस छोटे साथी मुंबईकर को क्रिकेट की बारीकियां बताईं। बिशन सिंह बेदी के लिए ‘छोटू’ और गावस्कर के लिए रियल लिटिल मास्टर सचिन के शिखर पर लंबे समय तक काबिज रहने का सबब खुद पर गजब का आत्मविश्वास था।
सचिन क्रिकेट में शिखर चूमने की तमन्ना रखने वाले हर क्रिकेटर के रोल मॉडल हैं। फिर चाहे वह भारतीय हो, या किसी अन्य देश का। क्रिकेट में कामयाबी का पैमाना बीते जमाने में ब्रैडमैन थे, लेकिन अब सचिन हैं। सचिन और ब्रैडमैन, दोनों मैदान के भीतर और बाहर एकदम शांत रहे। विवादों से दोनों ही दूर। कामयाबियां इतनी कि खुद कामयाबी का पैमाना ही बन गए। तकनीकी रूप से सबसे सक्षम।
सचिन बेहतरीन बल्लेबाज हैं ही, बेहतरीन बॉलर भी हैं। उन्होंने बतौर गेंदबाज पेस, स्पिन और स्विंग से कमाल दिखाया। उन्होंने भारत की कप्तानी भी की, लेकिन उनका मन इसमें रमा नहीं। उन्होंने बहुत जल्दी ही यह समझ लिया था कि इससे उनकी खुद की बल्लेबाजी पर उलटा असर पड़ सकता है। हालांकि वह बतौर कप्तान अपने समकालीन सौरभ गांगुली के मुरीद हैं। महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी की प्रतिभा को सचिन ने शुरू में ही परख लिया था। सचिन की पैरवी पर ही धोनी को टीम इंडिया की कप्तानी का मौका मिला।
सचिन की बल्लेबाजी सुनील गावस्कर का अनुशासन और विव रिचडर्स की आक्रामकता का आदर्श मिश्रण कही जा सकती है। सचिन की प्रतिभा के तो सभी कायल हैं। सचिन के लिए क्रिकेट जिंदगी है और रहेगी। पिछले करीब एक साल से वह खुद संभवतः अपनी ही कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे थे। उनका दिमाग और दिल अब भी क्रिकेट में है, लेकिन उनके पैर क्रिकेट के लिए जरूरी कदमताल नहीं कर पा रहे थे। 40 की उम्र का असर उन पर दिखने लगा था। उन्होंने खुद इस हकीकत को समझा। टेस्ट क्रिकेट को भी अलविदा कहने का फैसला कर उन्होंने खुद के द्वंद्व को जीत लिया है।
अब टीम इंडिया को सचिन के बिना क्रिकेट मैदान पर उतरने की आदत डालनी होगी। इसके साथ ही बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई उनके करीब भी पहुंच पाएगा। हालांकि खुद सचिन का कहना है कि भारत के युवा तुर्क विराट कोहली और चेतेश्वर पुजारा में विश्व क्रिकेट में कामयाबियों की नई दास्तां लिखने का दम है। लेकिन सच यह भी है कि सचिन-सा कर्मयोगी क्रिकेट में न कोई है, और न होगा।