उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक शानदार बंगले को जिस तरह खाली करने के साथ नष्ट कर दिया, वह कोई सामान्य खबर नहीं है। उसके बाद उन्होंने यह बयान दिया है कि सरकार सूची भिजवा दे, हम वे सारे सामान वापस भिजवा देंगे। ऐसी ढिढाई के लिए कौन-सा शब्द प्रयोग किया जाए, यह तलाश करना मुश्किल है।
इतना ही नहीं, पत्रकारों को बंगला दिखाने की व्यवस्था करने वाले सरकारी अधिकारियों को उन्होंने धमकी भी दी कि कल जब मेरा शासन आएगा, तब यही अधिकारी कप-प्लेट उठाएंगे। मजे की बात यह है कि सपा के लोग प्रदेश सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि वह जान-बूझकर मामले को गलत ढंग से पेश कर रही है, ताकि उनके नेता बदनाम हो जाएं।
इस प्रकरण के तीन पहलू हैं। सबसे पहला है बंगले का वाकई खंडहर में परिणत होना। फर्श से लेकर छतें, उद्यान, स्विमिंग पूल, साइकिल ट्रैक, जिम, सेंट्रलाइज्ड एसी, बैडमिंटन कोर्ट आदि को किस तरह तहस-नहस किया गया, उसका पूरा ब्योरा सामने आ चुका है। जो व्यक्ति दो-दो बार सांसद रहा हो, जो प्रदेश का मुख्यमंत्री बना हो और पार्टी का प्रधान होने के नाते भविष्य में मुख्यमंत्री पद का दावेदार हो, उससे ऐसी ओछी हरकत की उम्मीद कोई नहीं कर सकता।
बंगला तो उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर खाली करना पड़ा है। क्या उन्होंने बंगला खाली करने की खीझ उतारी है?
लेकिन गुस्से और खीझ में कोई सारा सामान और फर्नीचर लेकर नहीं जाता। यह तो लालच का प्रतीक है। सारे सामान ले जाने का मतलब है कि वह निर्माणाधीन अपने निजी बंगले में इनका उपयोग करेंगे। कानूनी कार्रवाई तो बाद की बात है। प्रदेश सरकार ऐसा करेगी या नहीं, यह भी अभी तय नहीं। किंतु मामला एक बड़े नेता के आचरण का, उसकी नैतिकता का है।
इसी से जुड़ा इसका दूसरा पहलू यह है कि कोई नेता यह क्यों मान लेता है कि अगर वह एक बार मुख्यमंत्री या मंत्री बना, तो जो बंगला उसे मिला है, वह आजीवन उसके पास रहेगा? जिस तरह उस बंगले का पुनर्निर्माण किया गया, उससे तो ऐसा ही लगता है, मानो कोई निजी बंगला बनाया गया हो। यह कैसा लोकतांत्रिक व्यवहार है? अखिलेश यादव की पार्टी कहने को तो समाजवादी है, पर यह वंशानुगत नेतृत्व की पार्टी हो चुकी है। बंगले का आंतरिक पुनर्निर्माण तथा साज-सज्जा कराते हुए यह भी ध्यान में रहा होगा कि इसमें हमारी कई पीढ़ी रहने वाली है।
इसका तीसरा पहलू देश के एक-एक व्यक्ति को गंभीरता से सोचने को मजबूर करने वाला है कि आखिर हम कैसे लोगों को अपना नेता चुनते हैं। उत्तर प्रदेश के संपत्ति विभाग से जो सूचना मिल रही है, उसके अनुसार मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश यादव ने उस बंगले का कायाकल्प करने के लिए दो किस्तों में 42 करोड़ रुपये खर्च कराए। हो सकता है कुछ ज्यादा भी खर्च हुआ हो। कई स्थानीय पत्रकार कह रहे हैं कि 80 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। जिस प्रदेश में लाखों लोगों को छत नसीब नहीं हो,वहां का मुख्यमंत्री इस तरह राजसी ठाठ में रहे, तो उसे आप क्या कहेंगे?
संसदीय लोकतंत्र में नेताओं को अपने आचरण से जनता को संयमित, नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देनी चाहिए। किंतु समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने तो शानो-शौकत में शायद देश के सारे नेताओं को पीछे छोड़ दिया। ऐसे में जनता को यह तय करना है कि हम ऐसे लोगों को वाकई अपना नेता चुनें या नहीं।