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संघ ने चुन ली अपनी राह

Fri, 21 Jun 2013 09:19 PM IST
अरुण नेहरू
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यह कांग्रेस एवं भाजपा के हालात का जायजा लेने का समय है। पिछले हफ्ते दोनों पार्टियों ने 2014 के लक्ष्य के मद्देनजर निर्णायक कदम उठाए हैं। राज्यों में क्षेत्रीय दलों पर इनका प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है, पर चुनाव के बाद होने वाले गठबंधन के खेल में मनोवैज्ञानिक रूप से कांग्रेस को फायदा मिलेगा, क्योंकि भाजपा की कट्टर हिंदुत्ववादी नीति के कारण कुछ ही दल उसकी ओर आकर्षित होंगे। पिछले हफ्ते के फैसलों का राजनीतिक निहितार्थ समझने के लिए हमें सावधानी बरतनी होगी।
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कांग्रेस ने महासचिव से लेकर संयुक्त सचिव तक के कामकाज का फिर से बंटवारा किया है और मंत्रिमंडल में भी थोड़ा बदलाव किया है। पार्टी और सरकार में ये बदलाव चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखकर किए गए हैं। कांग्रेस ने राजस्थान को प्राथमिकता दी है, जहां पार्टी की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। दिल्ली में भी कांग्रेस की स्थिति बेहतर है, जहां शीला दीक्षित पार्टी का नेतृत्व करेंगी।

यदि असंतुष्ट नेता दबाव बनाने की कोशिश करेंगे, तो वे राजनीतिक 'हाराकिरी' को ही अंजाम देंगे। छत्तीसगढ़ में जिस तरह सुनियोजित तरीके से कांग्रेसी नेताओं की बर्बर एवं अमानवीय हत्या की गई, ऐसे में 'जीत-हार' की बात करना असम्मानजनक होगा। पर इतना जरूर  है कि इस बार चुनाव में रिकॉर्ड मतदान होगा और वहां के आम लोगों द्वारा लड़ा जाएगा यह चुनाव।
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बिहार में भाजपा ने जो किया, वह पहले से तय था, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कट्टर हिंदुत्व की नीति पर चलने का फैसला कर लिया था। पिछले 17 वर्षों से भाजपा के साथ रहे नीतीश कुमार जानते थे कि क्या होने वाला है, इसलिए वह शुरू से चेतावनी दे रहे थे। जद (यू) प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को शीघ्र तय करना चाहती थी, जबकि राजग इस मसले को अभी अंधेरे में रखना चाहता था।

लालकृष्ण आडवाणी का दुःस्वप्न सच हो गया। आडवाणी ने जो किया, उसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि वह पार्टी को मुश्किल स्थिति से उबारना चाहते थे। मगर पार्टी ने नरेंद्र मोदी को चुना और देखिए कि किस तरह भाजपा की विश्वासघात रैली के बाद बिहार में हिंसक घटनाएं हुईं। मेरा आकलन है कि शरद यादव और नीतीश कुमार अपनी पार्टी को जीत की ओर ले जाएंगे।

नीतीश कुमार ने आसानी से विश्वास मत हासिल कर लिया। विश्वास मत के दौरान भाजपा सदन से बाहर रही, जो अपेक्षित ही था। हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक के बाद यह भाजपा की दूसरी हार है। छत्तीसगढ़ में भी भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं है। जाहिर है, पार्टी के लिए भारी संकट की स्थिति है। मैं जद (यू) एवं कांग्रेस के गठजोड़ का भविष्य नहीं देख रहा हूं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि भविष्य में नीतीश कुमार एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय क्षत्रप होंगे और सरकार गठन के समय धर्मनिरपेक्ष समूह का समर्थन करेंगे।

मेरा आकलन है कि कांग्रेस अगले लोकसभा चुनाव में 140 से 150 सीट जीतेगी, जबकि छत्तीसगढ़ और बिहार में गंभीर संकट में फंसी भाजपा 120 से 125 सीटें जीतेंगी। क्षेत्रीय दल 260 से 270 के बीच सीटें जीतेंगे। संघ परिवार के कट्टर हिंदुत्व की नीति के मद्देनजर भाजपा 2014 के चुनाव में दो दशक पुराने अयोध्या मुद्दे को उठाएगी और नरेंद्र मोदी अपनी स्थिति मजबूत बनाने के लिए इसे प्रमुखता देंगे।

शिव सेना और अकाली दल को छोड़कर शायद ही कोई पार्टी होगी, जो अल्पसंख्यकों और यहां तक कि उदारवादी हिंदुओं को उत्तेजित करने वाली नीति का समर्थन करेगी। पिछले साठ वर्षों के दौरान भाजपा मात्र छह वर्ष शासन में रही है और वह भी अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिभा, करिश्मे एवं दृष्टि की वजह से, जिनका कट्टर हिंदुत्व से कोई लेना-देना नहीं था। गुजरात दंगे के बाद 2004 के चुनाव में उनकी उपस्थिति भी पार्टी की मदद नहीं कर सकी।

वास्तविकता यह है कि भाजपा में शीर्ष स्तर पर सत्ता संघर्ष के चलते संघ परिवार की स्थिति मजबूत हुई है और वही पार्टी का एजेंडा तय करता है। उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा मजबूत क्षेत्रीय दल हैं और दोनों मिलाकर अस्सी में पचास सीटें जीतेंगे। भाजपा की कीमत पर वहां कांग्रेस को फायदा होगा। सहयोगी रालोद के साथ वह प्रदेश में 13 से 18 सीटें जीत सकती हैं।

हर कोई बिहार की घटनाओं को सावधानीपूर्वक देख रहा है। वहां शरद यादव एवं नीतीश कुमार ने पहला चरण जीत लिया है। सबकी नजर अगले कुछ हफ्तों में भाजपा की प्रतिक्रिया पर होगी, क्योंकि वह भारी दबाव में है। उधर तृणमूल कांग्रेस भी माकपा के दबाव में है और उसे अपने अल्पसंख्यक मतों को बचाना है। राजद एवं लोजपा के लिए भी स्थिति कठिन है, क्योंकि बिहार में धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए जगह सीमित है।

जाहिर है, आने वाले दिन राजनीतिक दृष्टि से काफी दिलचस्प होंगे। इस राजनीतिक घटनाक्रम के बीच उत्तराखंड में बाढ़ की स्थिति भयावह है। कई शहर तबाह हो गए हैं। कुल हताहत लोगों की वास्तविक संख्या कुछ समय बाद ही मालूम होगी। प्रकृति का विनाशकारी रूप दिल दहलाने वाला है। मैंने इस क्षेत्र में अचानक आई बाढ़ के असर को देखा है, लेकिन इस बार स्थिति बहुत ही खराब है।

केंद्र एवं राज्य सरकारों के साथ सेना भी बचाव कार्य में लगी है। इस दुख से जल्दी उबरने के लिए प्रार्थना ही की जा सकती है। केंद्र सरकार को राज्य के भावी पुनर्निर्माण के लिए एक विशेष मंत्री की नियुक्ति करनी चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि लोग खुशी-खुशी पीड़ितों की मदद करेंगे।
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