सिनेमा हॉल के बाहर टिकेट खरीदने के लिए
लंबी लाइन में खड़े-खड़े ये लगता है कि
यह इकलौती कतार है जिसके आगे टिकटें
बांटता आदमी, निष्पक्षता से, बिना भेदभाव के,
ये बिना देखे कि सामने कौन है,
करता चला जाता है अपना काम,
ये इकलौती लाइन है जहां अपना नंबर आने पर
ना डर लगता है, ना आशंकित करता है निकट भविष्य,
वो साधारण सा टिकट काटने वाला आदमी,
जो बस टिफिन खाने उठता है एक बार,
हर सुबह छेड़ देता है जंग
दुनिया में लगने वाली हर कतार के विरुद्ध
-अंचित बाहरी अनुभव को भीतर की दुनिया से जोड़ते हुए मध्य वर्ग की जुबान में बात करते हैं। पटना में रहते हैं।