ऐसे मौसम में दृश्यता घटने से वाहन चालकों को अधिक सावधानी बरतनी चाहिए, जबकि होता उल्टा ही है। एक्सप्रेस-वे पर निर्धारित गति सीमा से अधिक रफ्तार, वाहनों के बीच सुरक्षित दूरी के नियम का पालन न करना और लेन-अनुशासन का उल्लंघन आम बात हैं। धुंध के वक्त ऐसी लापरवाही कई गुना घातक हो जाती है। एक वाहन का अचानक रुकना या फिसलना पीछे से आती गाड़ियों की पूरी कतार को चपेट में ले लेता है। मथुरा में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जहां क्षतिग्रस्त बसों से निकले शवों की हालत इतनी बुरी है कि पहचान के लिए उनका डीएनए परीक्षण कराना पड़ रहा है।
इस तरह की दुर्घटनाओं के पीछे दो कारक स्पष्ट हैं-धुंध और तेज गति। लेकिन समस्या इनके संयोजन से पैदा होती है, क्योंकि धुंध की मौजूदगी में गति सीमा का कठोर अनुपालन, स्वचालित चेतावनी प्रणालियां और त्वरित प्रवर्तन अनिवार्य हो जाता है। दुर्भाग्य से, इन मोर्चों पर हमारी तैयारी आधी-अधूरी ही दिखती है। एक्सप्रेस-वे जैसे नियंत्रित प्रवेश मार्गों, जिनके उपयोग के लिए भारी शुल्क भी देना होता है, पर अपेक्षा होती है कि यहां सुरक्षा मानक सर्वोच्च श्रेणी के होंगे, फिर भी कई हिस्सों में इनकी कमी अखरती है।
हाल ही में, पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे पर हुई ऐसी ही दुर्घटनाओं और मथुरा हादसे के बाद, उत्तर प्रदेश एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीईआईडीए) ने कोहरे की स्थिति के बारे में रियल टाइम घोषणाएं करने के लिए सभी टोल प्लाजा पर एक प्रणाली सक्रिय करने की बात की है, लेकिन सवाल यह है कि किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही ऐसी बुनियादी सतर्कताओं पर ध्यान क्यों जाता है? अफसोस की बात है कि धुंध के दौरान गति सीमा को अस्थायी तौर पर कम करना, लेन-वार चेतावनी देना और ट्रैफिक को चरणबद्ध ढंग से नियंत्रित करना अब तक व्यवस्थित अभ्यास नहीं बन सका है। वाहन चालकों को भी ऐसी दुर्घटनाओं से सबक लेना चाहिए। कोहरा प्राकृतिक है, लेकिन रफ्तार तो मानवीय चुनाव है। सभी को इन सबकों को गंभीरता से लेना होगा, क्योंकि हर दुर्घटना के पीछे आंकड़ों से परे, एक परिवार की अपूरणीय क्षति भी छिपी होती है।