फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

इस जुगलबंदी में जोखिम भी हैं

Fri, 30 Jan 2015 08:34 PM IST
एम के वेणु
विज्ञापन
विज्ञापन
ओबामा-मोदी के संयुक्त बयान के जरिये भावी रणनीतिक सहयोग की जो व्यापक रूपरेखा पेश की गई, वह जरूरी थी और उसका स्वागत किया जाना चाहिए। हालांकि भारत को इस बात के प्रति सतर्क रहना होगा कि यह चीन के साथ उसके रिश्ते की कीमत पर न हो। चीन के आर्थिक दबदबे को आसानी से खारिज करने के बारे में नहीं सोचा जा सकता।
विज्ञापन


भारत को नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका और चीन के बीच गहरे आर्थिक व व्यापारिक रिश्ते हैं, जो उन्हें एक-दूसरे पर निर्भर बनाते हैं। नई दिल्ली में उद्योग जगत के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए ओबामा ने बताया कि भारत के साथ सौ अरब डॉलर के व्यापार की तुलना में चीन के साथ अमेरिका का वार्षिक व्यापार 550 अरब डॉलर का है। चीन के पास 40 खरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है और उसमें से 70 फीसदी से ज्यादा उसने अमेरिकी सरकार के बॉन्ड्स में निवेश किया है। इसका साफ मतलब है कि अमेरिकी सरकार ने चीन से तीस खरब डॉलर उधार लिया है। जो रकम अमेरिका ने चीन के केंद्रीय बैंक से उधार ली है, वह भारत के 20 खरब डॉलर के संपूर्ण जीडीपी से भी ज्यादा है! इसलिए तार्किक निष्कर्ष यही है कि अमेरिका शायद ही उस देश के साथ उलझे, जहां की सरकार से उसने करीब 30 खरब डॉलर उधार लिया है। अमेरिका अधिक से अधिक यही कर सकता है कि वह चीन को संतुलित करने के लिए किसी उभरती हुई ताकत को सामने करने की कोशिश करे। इससे अधिक वह कुछ नहीं कर सकता।

भारत को इस पहलू को समझना चाहिए और ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए, जो चीन के साथ स्थायी वैमनस्य का कारण बन जाए। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह वही बराक ओबामा हैं, जिन्होंने 2009 में सत्ता में आने के तत्काल बाद चीन की यात्रा की थी और एशिया में सुरक्षा और स्थिरता प्रदान करने में अमेरिका और चीन की साझा जिम्मेदारी की बात की थी। उस बयान ने 'जी-2' के रूप में अमेरिका और चीन की साझेदारी में वैश्विक शासन की आशंका को बल दिया था। अब अमेरिका हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया को शामिल कर बहुपक्षीय सुरक्षा ढांचे की बात कर रहा है। इस बात की क्या गारंटी है कि अमेरिका का अगला राष्ट्रपति, चाहे वह कोई भी हो, चीन के साथ समझौते का प्रयास नहीं करेगा। चीन ने ओबामा-मोदी वार्ता के नतीजे को न केवल सतही बताया, बल्कि उसे भरोसा है कि भारत-चीन सीमा पर यदि चीनी सैनिकों ने अतिक्रमण किया, तो अमेरिका उसमें दखल नहीं देगा। लिहाजा भारत को अमेरिका व चीन, दोनों के साथ अपने रिश्ते में संतुलन बनाए रखना चाहिए।
विज्ञापन


वैसे ओबामा-मोदी के बीच वार्ता अच्छी रही, लेकिन खुद ओबामा ने कहा कि चीजें रातोंरात नहीं बदलतीं। संयुक्त बयान में आशावादी बात यह है कि दोनों देशों में पर्यावरण हितैषी व्यापार और निवेश पर सहमति बनी है। इससे साफ है कि भारत और अमेरिका स्वच्छ ऊर्जा पर एक सहयोगी ढांचा तैयार करने की तरफ बढ़े हैं। भविष्य में दोनों देशों के बीच वैसा ही द्विपक्षीय समझौता हो सकता है, जैसा अमेरिका और चीन के बीच हुआ है। ओबामा ने कहा है कि गरीब भारतीय, खासकर ग्रामीण भारत के लोग, जो बहुत कम ऊर्जा का उपभोग कर पाते हैं या जो जैव ईंधन का उपयोग नहीं कर पाते, वे ऊर्जा के हरित स्रोतों से ज्यादा ऊर्जा उपभोग कर सकते हैं। अमेरिका ऐसे करीब 60 करोड़ भारतीयों को सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए धन और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर सहमत हो सकता है। ओबामा मानते हैं कि यह वर्ग कार्बन उत्सर्जन फैलाने वाले प्रौद्योगिकी को नकार कर स्वच्छ ऊर्जा की तरफ बढ़ सकता है।

व्यावहारिक अर्थों में ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय प्रधानमंत्री अमेरिका के साथ सौर ऊर्जा और शेल गैस पर समझौते के लिए कहीं ज्यादा उत्सुक हैं, क्योंकि अमेरिकी कंपनियों के साथ परमाणु ऊर्जा समझौते का परिचालन, लागत और सुरक्षा के लिहाज से काफी मुश्किल होगा।

असैन्य परमाणु समझौते पर भारत और अमेरिका के बीच हुए समझौते और सहमति का पूरा ब्योरा अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ है। हम सभी जानते हैं कि भारत सरकार अमेरिका को वैधानिक तौर पर कारोबार का अधिकार देगी, जो उपकरण आपूर्ति करने वाली अमेरिकी कंपनियों को किसी परमाणु ऊर्जा संयंत्र में हादसे की स्थिति में पीड़ितों द्वारा किए जाने वाले मुकदमे से बचाएगी।

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इसे वैधानिक चुनौती दी जा सकती है, क्योंकि संसद में भाजपा द्वारा पूरी तरह समर्थित परमाणु उत्तरदायित्व कानून का अनुबंध 46 पीड़ितों को क्षतिपूर्ति कानून के तहत क्लास एक्शन सूट के जरिये सहारा देता है। इस अनुबंध के रहते दोनों देशों के बीच परमाणु भागीदारी का वास्तविक व्यावसायीकरण नहीं हो सकता। इसे कमजोर करना भाजपा के लिए मुश्किल होगा।

बीमा प्रीमियम और क्लास एक्शन सूट से पैदा होने वाली संभावित चुनौती की गणना के बाद परमाणु ऊर्जा की लागत घरेलू ऑपरेटरों को हतोत्साहित करेगी। इन जोखिमों को देखते हुए भारत और अमेरिका दोनों को स्वच्छ ऊर्जा के अन्य स्रोतों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जहां प्रौद्योगिकी और सब्सिडी को आसानी से अपनाया जा सकता है। परमाणु सौदा अब केवल निर्यात नियंत्रित करने वाले क्लब में भारत के प्रवेश के लिए एक साधन है, जो हमारे देश में प्रौद्योगिकियों के मुक्त प्रवाह को सक्षम बनाएगा। लेकिन यह सब तभी संभव होगा, जब भारत अंततः अमेरिका के साथ एक व्यापक सौदे पर सहमत हो जाए, जो बौद्धिक संपदा अधिकार, बैंकिंग, बीमा, मल्टीब्रांड रिटेल आदि से संबंधित हमारे कानूनों को लेकर अमेरिकी चिंता का निवारण करता हो। भारत इस सौदे में से अपनी इच्छा के मुताबिक न तो चुनाव कर सकता है और न ही अमेरिकी मांग को ठुकरा सकता है। दोनों नेताओं के बीच की घनिष्ठता तभी खत्म हो जाएगी, जब कठिन राजनीति और राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखा जाएगा।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें